कांग्रेस को आजसू की चुनौती, बीजेपी के समर्थक किधर, राष्ट्रीय पार्टी पर अकील की नजर,असमंजस में वोटर

एसडीपीआई, टीएमसी व एआईएमआईएम अल्पसंख्यक वोटरों में करेगी सेंधमारी

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कृपा सिंधु बच्चन तिवारी

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पाकुड़। हालांकि चुनाव आयोग ने तिथि घोषणा नहीं की है, लेकिन अगर पाकुड़ विधानसभा क्षेत्र में पार्टियों और सम्भावित उम्मीवारों की सक्रियता देखें तो लगता है, झारखंड में चुनाव का बिगुल बज चुका है। लगातार कांग्रेस की ओर से सफल बेटिंग कर रहे पूर्व मंत्री आलमगीर आलम फिलवक्त जेल में हैं।

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उनके बाहर न रहने के कारण पाकुड़ विधानसभा का चुनाव दिलचस्प बनता नजर आ रहा है। पूर्व मंत्री आलमगीर आलम के नजदीकी और पारिवारिक मित्र रहे पत्थर व्यवसायी अली अकबर के पुत्र अजहर इस्लाम आजसू से सम्भावित उम्मीदवार के तौर पर सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। गांव गांव उनके जनसंपर्क में भीड़ की जुटान को देखकर स्वयं अजहर सहित उनके समर्थक उत्साहित हैं।

अजहर इस्लाम स्वयं को जमीनी तौर पर जुड़ा साबित करने में गांव में रसोई तक पहुंच मिट्टी और कोयले के चूल्हे पर महिलाओं के साथ रोटियां सेंक रहे हैं, तो बीड़ी बांधने में भी हाथ आजमा कर स्वयं को महिला मतदाताओं के साथ जोड़ रहे हैं। ग्रामीण मतदाताओं की ऐसे मौकों पर जुटती भीड़ मतदान में कितना परिवर्तित हो पाएगा, ये तो वक्त तय करेगा। उल्लेखनीय है कि पाकुड़ विधानसभा क्षेत्र में अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या ही परिणाम तय करता रहा है, लेकिन इसमें सेंध लगाने के लिए एसडीपीआई से जिला परिषद सदस्य मौलवी हंजिला शेख और एआईएमआईएम के हाजी तनवीर आलम भी मैदान में ताल ठोके बैठे हैं।

इधर पश्चिम बंगाल से प्रभावित इस विधानसभा क्षेत्र में अधिवक्ता अशराफुल शेख को भी नकारा नहीं जा सकता। वे भी स्वयं और पार्टी टीएमसी की तरफ से अपना प्रभाव डालेंगे। पूर्व विधायक अकील अख्तर ऐसे तो किसी राष्ट्रीय पार्टी की तलाश में हैं, लेकिन अभी अपना एक सामाजिक संगठन बनाकर मैदान में ताल ठोकने को तैयार हैं।

अकिल अख्तर आलमगीर आलम के हमेशा प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस के परम्परागत रहे पाकुड़ सीट पर फिलहाल इतनी चुनोती नजर आ रही है। लेकिन उम्मीदवार के तौर पर अगर मतदाताओं के बीच मन को टटोला जा रहा है तो यह बात खुलती सी दिखती है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों की नजर में वर्तमान विधायक आलमगीर आलम ने अगाध पैसे जरूर कमाए हों, लेकिन एक व्यवहारिक इंसान के तौर पर क्षेत्र में जात पात और सम्प्रदाय से ऊपर उठकर आदमी भी कम नहीं कमाये हैं। इसलिए अगर वे जेल से भी चुनाव लड़ते हैं तो उनकी जीत तय है, ये आम लोगों की चर्चाओं में है। हालांकि आजसू के अजहर इस्लाम इस आसन्न चुनाव में एक चुनौती जरूर साबित होते नजर आ रहे हैं।

आजसू और बीजेपी में गठबंधन की चर्चाएं अजहर इस्लाम के समर्थकों में जरूर सुना जा सकता है और बीजेपी पाकुड़ सीट आजसू के लिए छोड़ सकती है, यह भी चर्चा है। लेकिन एक पहलू यह भी है कि आजसू और भाजपा गठबंधन की शर्त पर भाजपा के मतदाताओं में असंतोष की बातें भी सामने आ रही है।एक घुंघुनाहट सी भाजपा के मतदाताओं में अहसासा जा सकता है कि अगर गठबंधन की शर्त पर आजसू के अल्पसंख्यक उम्मीदवार को ही वोट देना पड़ेगा, तो आलमगीर आलम बेहतर विकल्प है।

इधर पूर्व जिला परिषद उपाध्यक्ष सह भाजपा नेता मुकेश कुमार शुक्ला उर्फ़ पिंकू शुक्ला चुनाव मैदान में उतरने के लिए मन बना चुके है. हालांकि भाजपा से आधे दर्जन लोग चुनाव लड़ने की मौन महत्वकक्षा पाल रखे है. लेकिन मुखर होकर पिंकू शुक्ला ही भाजपा से अपना दाव ठोंक रहे है. वे यहाँ तक कह रहे है की अगर भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो भी मैं चुनाव जरूर लड़ूंगा.लेकिन आजसू-भाजपा के गठबंधन को देखा जाए और निर्दलीय पिंकू शुक्ला के दावे को भी टाटोला जाय तो भाजपा के मतदाता एक तीसरे विकल्प के तौर पर आलमगीर से नाराज नहीं दिखते है.ऐसे में कांग्रेस गठबंधन के साथ भाजपा मतदाताओं का साथ एक रिकॉर्ड बनाने में इतिहास बन जाएगा। लेकिन कांग्रेस में भी आलमगीर आलम के परिवार से किसी ओर की तरफ देखकर विकल्प तलाशने की बात अंदरखाने से आ रही है। ऐसे में अभी कोई भी सम्भावनाओं पर पूरा क्षेत्र असमंजस में है। जो भी हो, लेकिन पाकुड़ में आसन्न चुनाव अभी से सम्भावनाओं में सम्भावना तलाशने में दिलचस्प सा दिख रहा है।

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