समाचार चक्र संवाददाता
पाकुड़।बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में पुलिस जांच से लेकर मेडिकल परीक्षण,बयान दर्ज करने और न्यायालय में साक्ष्य प्रस्तुत करने तक किसी भी स्तर पर लापरवाही न हो।बच्चे को न्याय दिलाने की प्रक्रिया ऐसी हो,जिसमें उसकी सुरक्षा और मानसिक स्थिति का विशेष ध्यान रखा जाए। इसी उद्देश्य को लेकर शनिवार को सिविल कोर्ट,पाकुड़ के कॉन्फ्रेंस हॉल में बीएनएसएस और पॉक्सो अधिनियम के तहत बाल अधिकार एवं सुरक्षा उपायों को मजबूत करने के लिए जिला स्तरीय बहु- हितधारक परामर्श कार्यशाला आयोजित की गई।झालसा रांची के निर्देश पर जिला विधिक सेवा प्राधिकार,पाकुड़ के तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला की अध्यक्षता प्रभारी प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह अध्यक्ष डालसा पाकुड़ कुमार क्रांति प्रसाद ने की। कार्यक्रम का उद्घाटन न्यायिक एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।
जांच में देरी से कमजोर पड़ता है केस,समय सीमा का पालन जरूरी—
कार्यशाला में बाल अपराध से जुड़े मामलों की जांच में होने वाली देरी और पुलिस स्तर पर होने वाली प्रक्रियात्मक कमियों को गंभीरता से उठाया गया।अधिकारियों को बताया गया कि बीएनएसएस की धारा 193 के तहत जांच पूरी करने के लिए निर्धारित समयसीमा का पालन जरूरी है।वहीं धारा 176 और 180 के तहत दर्ज बयानों की ऑडियो- वीडियो रिकॉर्डिंग तथा धारा 230 के तहत शिकायतकर्ता को सूचना देने की प्रक्रिया पर भी विस्तार से चर्चा हुई।बीएनएसएस की धारा 183 के तहत बयान दर्ज करने में अनावश्यक देरी तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 के तहत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए आवश्यक प्रमाणपत्र जैसी प्रक्रियाओं को लेकर भी अधिकारियों को जानकारी दी गई।
पोक्सो में अनिवार्य रिपोर्टिंग,बच्चे से पूछताछ में संवेदनशीलता पर जोर—
पॉक्सो मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु के रूप में धारा 19 के तहत अनिवार्य रिपोर्टिंग पर चर्चा की गई.अधिकारियों को बताया गया कि बाल यौन अपराध की जानकारी मिलने के बाद रिपोर्टिंग में देरी नहीं होनी चाहिए।साथ ही, बच्चों से बयान लेने के दौरान उन्हें दोबारा मानसिक आघात न पहुंचे,इसका विशेष ध्यान रखने की जरूरत बताई गई।किशोर पुलिस इकाइयों के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत तत्काल और गैर-आघातकारी तरीके से बच्चे का बयान दर्ज करने पर जोर दिया गया।
कार्यशाला में पॉक्सो अधिनियम में हुए संशोधनों के तहत कठोर दंड के प्रावधानों तथा जांच और अभियोजन के दौरान आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर भी चर्चा हुई।
बाल तस्करी और क्रूरता के मामलों में भी अधिकारियों को किया गया जागरूक-—
किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के प्रावधानों पर भी विस्तृत जानकारी दी गई। इसमें देखभाल एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों, धारा 75 के तहत बाल क्रूरता तथा धारा 81 और 82 के तहत बच्चों की बिक्री एवं खरीद जैसे गंभीर अपराधों पर चर्चा हुई।अधिकारियों को बताया गया कि बच्चों की सही उम्र का निर्धारण मामलों में बेहद महत्वपूर्ण है।जन्म प्रमाणपत्र अथवा अन्य आयु संबंधी दस्तावेजों के सत्यापन में देरी से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए पुलिस,मेडिकल अधिकारियों और अन्य संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
पुलिस की छोटी चूक से कोर्ट में कमजोर हो सकता है पूरा मामला—
कार्यशाला का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा कि बाल अपराध के मामलों में जांच की एक छोटी प्रक्रियात्मक चूक भी अदालत में पूरे मामले को प्रभावित कर सकती है।साक्ष्य जुटाने, मेडिकल रिपोर्ट,उम्र के दस्तावेज,बच्चे का बयान,इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और गवाहों की सुरक्षा जैसे पहलुओं पर विशेष सावधानी बरतने को कहा गया।अधिकारियों को अभियोजन की गुणवत्ता बेहतर करने, साक्ष्यों को मजबूत तरीके से प्रस्तुत करने तथा गवाहों के मुकरने की स्थिति को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने की जानकारी दी गई।
न्यायिक प्रक्रिया को बाल-केंद्रित बनाने पर जोर—-
कार्यशाला में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि बाल अपराध के मामलों में कानून का उद्देश्य केवल दोषी को सजा दिलाना नहीं, बल्कि पीड़ित बच्चे को सुरक्षित वातावरण, सम्मान और न्याय उपलब्ध कराना भी है।कार्यक्रम का संचालन डालसा सचिव रूपा बंदना किरो ने किया। मौके पर अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी विशाल मांझी,डीईओ अनीता पूर्ति,जिला बाल संरक्षण इकाई पदाधिकारी व्यास ठाकुर, जिला समाज कल्याण पदाधिकारी,जिला कल्याण पदाधिकारी, मेडिएटर अधिवक्ता, सीडब्ल्यूसी,जेजेबी बोर्ड के अधिकारी एवं सदस्य, एलएडीसीएस के अधिवक्ता,सपोर्ट पर्सन, पैरा लीगल वॉलंटियर्स, जांच अधिकारी, पर्यवेक्षक अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी सहित विभिन्न विभागों के पदाधिकारी एवं छात्र-छात्राएं मौजूद रहे.

