कृपा सिंधु बच्चन@समाचार चक्र
पाकुड़ । रेलवे के विजिलेंस ने पाकुड़ लोटामार कोयला लोड रेलवे साइडिंग पर पिछले हफ्ते एक सांकेतिक छापेमारी की। जिसमें कोयला लोड पूरी की पूरी मालगाड़ी ओवर लोडेड पाई गई। स्वाभाविक है कोई बहुत कड़ा कदम न उठाते हुए विजिलेंस ने ओवर लोडेड कोयले को उसी साइड पर खाली कर लेने का निर्देश दिया।
उल्लेखनीय है कि यहां सिर्फ ओवर लोडेड कोयले को उतारने का निर्देश दिया था। विजिलेंस के पदाधिकारी अपने निर्देशों के पूर्णत पालन होने की आशा से निर्देश के बाद चले गए। रेलवे विजिलेंस को बाद में अचानक सूचना मिली कि वहीं ओवर लोडेड मालगाड़ी साहेबगंज जिले के सकरीगली स्टेशन पर खड़ी है। जो अपने गंतव्य के लिए पाकुड़ से चल पड़ी थी।
विजिलेंस ने वहां पहुंचकर कार्रवाई की और चूंकि पहले निर्देश का न पालन करना संगीन अपराध है तथा ओवर लोड से पाकुड़ से पंजाब तक की रेलवे ट्रेक को संभावित हानि को नहीं नकारा जा सकता है। इसलिए तात्कालिक रूप से चालीस लाख जुर्माना लगाकर आगे की कार्रवाई के लिए विजिलेंस ने एक संकेत दे दिया। विजिलेंस की बात को न मानना और ओवर लोडेड गाड़ी को रवाना कर देना, निश्चित ही अपने आप में अनियमितता करने वालों के दुस्साहस पर सवाल उठाता है।
सोचने की बात है कि सिर्फ इसमें कोल कंपनी ही नहीं, बल्कि रेलवे के कांटे से लेकर रेल के पदाधिकारियों की मंशा भी सवालों के घेरे में आती है। पाकुड़ के लिए यह कोई नई बात नहीं है। पत्थर के रेलवे लोडिंग प्लॉट, उनके निर्गत होने की प्रक्रिया, कैंसिल रेलवे प्लॉटों पर अवैध कब्जा, बिना माइनिंग चालान के रेलवे द्वारा पत्थर की ढुलाई, जैसे कितने ही मामले जांच की प्रक्रिया में पड़ी हुई है।
आपको आश्चर्य होगा कि दो वर्ष पहले जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी सौरभ चंद्रा के निर्देश के आलोक में तत्कालीन वन क्षेत्र पदाधिकारी अनिल कुमार सिंह ने मालगाड़ी में लोडेड कोयला की जांच कर देखा कि वन विभाग के ट्रांजिट परमिट के बिना ही 59 बोगियां आल रेडी रवाना होने के लिए खड़ी है। पाकुड़ के रेलवे, वन विभाग एवं कोयला खनन से जुड़े इतिहास में यह पहला मौका था कि मालगाड़ी के 59 बोगियों को जब्त कर लिया गया और लिखित रूप से गार्ड को हैंड ओवर कर दी।
इस मामले में साइड इंचार्ज रामविलास हांसदा को हिरासत में भी लिया था। इस के लिए रेंजर ने हावड़ा डिविजनल मैनेजर को पत्र भी लिखा था। इसके बवजुद कोयले की ढुलाई न सिर्फ सड़क रास्ते से, बल्कि रेल के द्वारा भी बिना ट्रांजिट चालान के होता रहा और हो रहा है। जबकि रेंजर अनिल कुमार सिंह को अपनी इस निडरता वाली कार्रवाई के एवज में नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
आप समझ सकते हैं कि काले कोयले के काले कारनामे करने वाले कालाबाजारियों की औकात क्या है कि कार्रवाई करने वाले अधिकारी पर भी वे भारी पड़ जाते हैं। सरकार ने कोयले को वनोपज मानते हुए इसके परिवहन के लिए वन विभाग से ट्रांजिट परमिट की अनिवार्यता सुनिश्चित की है और इसके एवज में प्रति मैट्रिक टन 58 रुपये राजस्व वन विभाग को देकर ही रेलवे साइडिंग तक डंफरो को कोयला पहुंचाना है। उसके बाद का ट्रांजिट चालान भी खनन कंपनी को रेलवे को उपलब्ध कराना है। इस सब के बाद भी ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। जबकि कोयले का अवैध परिवहन का एक आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि जिस विभाग को भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 42 का अनुपालन कड़ाई से सुनिश्चित कराना है, उस विभाग के अधिकारी और कर्मी ही कई बार बगैर ट्रांजिट परमिट के कोयले लदे वाहनों को सुरक्षा घेरे में ले जाते देखे जाते हैं। जबकि वन विभाग ने झारखंड वनोपज नियमावली 20/20 के आलोक में विधि सम्मत कार्रवाई करने को लेकर पुलिस अधीक्षक को भी पत्राचार किया था।
बावजूद इसके….”जबकि तुहूं लूट, हमहौ लुटाब, लुटे के आजादी बा, सबसे ज्यादे उहे लूटिए जेकर देह पर खादी बा..” अब इस खादी के साथ सुविधानुसार स्थान विशेष पर अन्य शब्दों को रख इस पूरी अनियमितता की खेल को समझ सकते हैं। विश्वस्त रेलवे सूत्र बतातें है कि पैनम कोल माइंस की बंदी से पहले रेलवे के रैक के ओवर लोड की बात तो छोड़ दें, बल्कि कई बार तो रैक की बुकिंग पंजाब के लिए हुई थी। लेकिन पूरी की पूरी रैक कोयला सहित पंजाब न पहुंचकर कहीं और पहुंच गई। कुछ लोग तो दबी जुबां से यहां तक कहते है कि पाकुड़ का कोयला देश की सीमा पार तक अपनी काली करतूतों की कालिमा फैला आई है।