अबुल काशिम
पाकुड़। सदर प्रखंड के निर्वाचित मुखियाओं के लिए अबुआ आवास गले की हड्डी बन गई है। यह ना तो गले से उतर रही है और ना ही उगल रही है। आए दिन कोई ना कोई मुखिया या तो शिकायतें झेल रहे हैं, या कार्रवाई झेल रहा है। पंचायत से लेकर प्रखंड और जिला कार्यालय तक मुखियाओं की शिकायतें आना जारी है। मुखिया के खिलाफ अबुआ आवास के लाभुकों के चयन में या तो मनमानी या फिर गड़बड़ी का आरोप लेकर पहुंच रहे हैं। मुखिया के साथ-साथ वार्ड सदस्य और पंचायत सचिव पर भी आरोप लग रहे हैं। लाभुकों के चयन में रिश्तेदारों को प्राथमिकता देने या फिर लेनदेन के भी आरोप लगाए जा रहे हैं। फिलवक्त शिकायतों और आरोपों की इस आग में मुखिया और पंचायत सचिव ही जलते नजर आ रहे हैं। जबकि लाभुकों के चयन में विशेष तौर पर टीम बनाई गई है। जिला प्रशासन के आदेश पर टीम में शामिल पदाधिकारी या कर्मचारी को स्थल पर जाकर सही लाभुक का चयन करना है। अगर मुखिया गलत है तो टीम को उसी वक्त निर्णय लिया जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दोषी केवल मुखिया और पंचायत सचिव ही क्यों? यह सवाल लोगों के दिलों दिमाग में बना हुआ है।
मुखिया और कर्मियों में डर का माहौल
इधर हाल ही में मनीरामपुर पंचायत के मुखिया मजिबूर रहमान और पंचायत सचिव पर डीसी की कार्रवाई से मुखियाओं में डर का माहौल बना हुआ है। प्रखंड कार्यालय में कई मुखियाओं से बातचीत के दौरान उनमें एक डर का माहौल दिखा। इस दौरान कई मुखियाओं ने कहा कि लाभुकों के चयन में कोई भी गड़बड़ी से बचने की हर कोशिश की जा रही है। लेकिन फिर भी आरोप और शिकायतों से परेशान है। मुखियाओं ने कहा कि अबुआ आवास गले की हड्डी बन गई है। पंचायत में जरूरतमंदों की संख्या सरकार के द्वारा दिए गए टारगेट से कई गुना ज्यादा है और आवास सभी को एक साथ चाहिए। आखिर ऐसी स्थिति में मुखिया करें तो करें क्या, यह हाल है।
पंचायत सचिव सस्पेंड, मुखिया के वित्तीय शक्ति पर रोक
सदर प्रखंड के मनीरामपुर पंचायत के मुखिया और पंचायत सचिव के विरुद्ध अबुआ आवास के लाभुक के चयन में गड़बड़ी की शिकायत पर गाज गिरी है। पंचायत सचिव मिलड्रेड हांसदा को सस्पेंड कर दिया गया है। मुखिया मजिबूर रहमान के वित्तीय शक्ति पर रोक लगा दी गई है। हालांकि डीसी ने पंचायत सचिव और मुखिया के विरुद्ध कार्रवाई का आदेश जारी करते हुए मामले की जांच का भी आदेश दिया है। डीसी के आदेश पर मामले की जांच चल रही है। हालांकि इस मामले में मुखिया संघ ने डीसी से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
शिकायतों में कितना दम
अबुआ आवास को लेकर शिकायतों में कितनी सच्चाई है, यह जांच का विषय है। आवास के लाभुकों के चयन को लेकर मुखिया और पंचायत सचिव या कोई भी पंचायत प्रतिनिधि या कर्मी कितने दोषी हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि अधिकतर पंचायतों में इन दिनों ग्रामीण राजनीति हावी है। अधिकतर मामलों में ग्रामीण राजनीति भी सामने निकलकर आ रही हैं। सूत्रों का मानना है कि अगर किसी का नाम छूट जाता है या सूची से कोई कारण बस कट जाता है, तो वह व्यक्ति खुद की बातों को कम रखते हैं और दूसरों पर इल्जाम लगना शुरू कर देते हैं। यह बात सही है कि हर जरूरतमंद को आवास मिलना चाहिए। लेकिन यह भी देखना होगा कि सरकार ने पंचायत को टारगेट क्या दिया है और आवेदकों की संख्या कितनी है? निश्चित रूप से आवेदकों की संख्या टारगेट से कई गुना ज्यादा है। इसलिए प्रशासन को सारे बिंदुओं पर समीक्षा करने की भी जरूरत है।