कृपा सिंधु बच्चन@समाचार चक्र
पाकुड़। नये वर्ष 2025 की दहलीज पर खड़ा, बीते वर्ष 2024 का अंतिम माह दिसंबर जब राजनैतिक परिदृश्यों के पिछले वर्ष के अतीत में झांकने को कहता है तो देश, राज्य और क्षेत्रीय घटनाओं को टटोलने को विवश करता है।पूरे देश की चर्चा करना पाठकों का काफी वक्त लेगा, इसलिए क्रमबद्ध चर्चा में झारखंड के पाकुड़ विधानसभा क्षेत्र की ओर अगर देखें तो स्थानीय पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री आलमगीर आलम की गिरफ्तारी ने इस विधानसभा क्षेत्र के राजनैतिक मैदान के राजनीति और चुनाव परिणाम ने कई मौन संदेश दिए। हालांकि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी विधायक की कुर्सी आलमगीर साहब के परिवार में ही रह गया। लेकिन क्षेत्र के आलमगीर समर्थकों कांग्रेसियों ने इस बार अपने नए कोंग्रेसी विधायक के रूप में आलमगीर के पुत्र और सुलझे हुए स्वभाव के मिलनसार तनवीर आलम को देखना शुरू कर दिया था।अप्रत्याशित रूप से पूर्व मंत्री आलमगीर की गिरफ्तारी ने अचानक पूरे दृश्य को बदल दिया और आलमगीर की पत्नी निसात आलम को कांग्रेस ने मैदान में उतारा। निसात आलम की जीत में उनके और आलमगीर के पुत्र तनवीर आलम ने चुनावी रथ का संचालन ऐसा किया कि उन्होंने ये साबित कर दिया कि कांग्रेस और आलमगीर आलम के भविष्य का उत्तराधिकारी पाकुड़ में उनके अलावा कोई नहीं है। यह बात और है, कि परिस्थितियों तथा अंदेशाओं ने इस बार कांग्रेस की कमान तनवीर की मां ने संभाली। लेकिन साये की तरह तनवीर मां के साथ लगे रहे। इधर भाजपा को भी शायद इस बात पर एक अफसोस कुरेद रहा है, कि इस बार आजसू के लिए ये सीट छोड़ना एक भूल साबित हुई। कई अप्रिय घटनाओं के आधार पर घुसपैठ पर हल्ला मचाती भाजपा अगर आजसू के लिए सीट न छोड़ती तो जीत और हार की समीक्षा न भी करें तो परिदृश्य कुछ और नजर आता। कांग्रेसी बैंकग्राउंड परिवार के आजसू उम्मीदवार भाजपा से इस सीट पर गठबंधन न होने पर भी चुनाव मैदान में जरूर ताल ठोकते और इससे कांग्रेस को हानि तथा भाजपा को फायदा नजर आता। क्षेत्र में मतदाताओं के समीकरण ऐसे हैं कि कांग्रेस की जीत तय थी। लेकिन भाजपा के मैदान में रहने से भाजपा के मत बढ़े और कांग्रेस के जीत के अंतर पर इसका प्रभाव नजर आता। इसका सबसे बड़ा कारण यह बनता कि आजसू उम्मीदवार जो पारिवारिक रूप से कांग्रेसी रहा है तथा कांग्रेस के मतों में सेंध लगाने वाले भी कम नहीं थे और दूसरी ओर आजसू-भाजपा के गठबंधन से नाराज लोग भी विभिन्न बैनरों के साथ चुनाव मैदान में नहीं रहते। ऐसे में जीत का अंतर कम नजर आता और भाजपा को भी अपने नारों मिलने वाले फायदा का पता चल पाता, जो विद्रोहियों की आड़ में छुप सा गया। इस तरह साल 2024 राजनीतिक घटनाक्रमों से भरा रहा और राजनीतिक तस्वीरें लगातार बदलती रही। यहां निराशा, पछतावा, खुशी सबकुछ दिखाई दिया। इस साल पूरे चुनाव के दौरान कुछ घटनाएं भी सामने आई, जो चर्चाओं में भी रहा और शायद ऐसा पहली बार हो रहा था। पाकुड़ विधानसभा में आमतौर पर चुनाव में शब्दों का वार जरुर सुनने और देखने को मिलता रहा है। लेकिन इस बार के चुनाव में शब्दों के वार के साथ-साथ माहौल भी थोड़ा गर्म जरुर नजर आया और प्रशासन को भी भागदौड़ करनी पड़ी। हालांकि प्रशासन ने जिस खूबसूरती से चुनाव संपन्न कराया, वह पाकुड़ के लिए इतिहास बन गया है। प्रत्याशियों के जुबानी जंग के बीच छोटी-छोटी घटनाओं को निपटाते हुए शांतिपूर्ण माहौल में चुनाव संपन्न कराने को लेकर जो तैयारियां थी, वो अविश्वसनीय था। प्रशासन ने मतदान व मतगणना कर्मियों से लेकर सुरक्षा कर्मियों को वह हर एक जरुरतों की चीजों की व्यवस्था कराई गई, जो पहले कभी नहीं देखा गया था।