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Maqsood Alam
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अनोखा मिसाल: जिस स्कूल में पढ़े वहीं बने टीचर, रिटायरमेंट के बाद भी नहीं टूटा नाता, सालों से निःस्वार्थ पढ़ा रहे शिक्षक दंपति

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Gunjan Saha
(Desk Head)

अबुल काशिम@समाचार चक्र
पाकुड़। आमतौर पर रिटायरमेंट के बाद इंसान परिवार के साथ समय गुजारना पसंद करते हैं। उम्र के अंतिम पड़ाव में घर की जवाबदेही से मुक्त होकर आराम की जिंदगी बीताना चाहते हैं। आज ऐसे शिक्षक दंपति के बारे में बताएंगे, जिनका रिटायरमेंट के बाद भी बच्चों और स्कूल से नाता नहीं टूटा। पति-पत्नी दोनों निःस्वार्थ भाव से उसी स्कूल में बच्चों को शिक्षा बांट रहे हैं। इतना ही नहीं, अब तो एकमात्र इंजिनियर पुत्र को भी इसमें शामिल कर लिया है, जो बच्चों को निःशुल्क पढ़ा रहे हैं। इससे शिक्षकों की कमी झेल रही स्कूल के बच्चों को समांतर रुप से शिक्षा भी मिल जाती है और बच्चों के बीच दिनभर का माहौल शिक्षक दंपत्ति को परिवार के साथ गुजारने के सुखद लम्हों को भी महसूस करा जाती है। शहर के बलिहारपुर के रहने वाले सेवानिवृत शिक्षक सुनाम पंडित और शुभ्रा रानी दत्ता से जुड़ी वो अनोखी बातें हैं, जो हमारे समाज के लिए प्रेरणा स्रोत है और यह एक अनोखा मिसाल भी है। मेथोडिस्ट चर्च ऑफ इंडिया से जुड़ी शहर के बलिहारपुर में स्थित ब्रिटिश जमाने में स्थापित बांग्ला कन्या मध्य विद्यालय (मिशन) में दोनों पति-पत्नी रिटायरमेंट के बाद भी सालों से निःशुल्क और निःस्वार्थ भाव से यहां पढ़ने वाले गरीब बच्चों को शिक्षा बांट रहे हैं। इसमें एक खास पहलू यह भी है कि सुनाम पंडित और शुभ्रा रानी दत्ता की बचपन की यादें भी इसी स्कूल से जुड़ी है। दोनों पति-पत्नी इसी स्कूल से प्रारंभिक पढ़ाई पूरी की थी। शिक्षा के प्रति समर्पित भाव रखने वाले दोनों की इच्छा भी शिक्षक के रूप में देश सेवा करने की रही है। पढ़ाई पूरी करने के बाद सुनाम पंडित और शुभ्रा रानी दत्ता की ख्वाहिशें पूरी भी हो जाती है। यह एक संयोग ही था कि शिक्षक की नौकरी मिलने के बाद दोनों का पदस्थापन भी इसी स्कूल में हो गया। एक खास मुलाकात में दंपति ने बताया कि बांग्ला कन्या मध्य विद्यालय में कक्षा 1 से 8 तक की पढ़ाई होती है। इसकी स्थापना ब्रिटिश शासन काल में साल 1887 में हुआ था। वर्तमान में साढ़े पांच सौ से भी ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं। इनमें लड़कें और लड़कियां दोनों शामिल हैं। बताया कि साल 1984 में शुभ्रा रानी दत्ता ने शिक्षक के रूप में योगदान किया। लगातार 40 साल सेवा प्रदान किया।

प्रधान अध्यापिका के रूप में भी साल 1991 से लगातार सेवा में रही। पत्नी के 11 साल की नौकरी के बाद साल 1995 में शिक्षक सुनाम पंडित ने भी अपना योगदान दिया। करीब 24 साल तक शिक्षक सुनाम पंडित ने भी स्कूल में सेवा दिया। इसके बाद अगस्त 2019 में शुभ्रा रानी दत्ता रिटायर हो गई। उधर शिक्षक सुनाम पंडित भी पिछले साल 2024 के सितंबर महीने में रिटायर हो गए। लेकिन रिटायरमेंट के बाद भी शिक्षक दंपति ने स्कूल में बच्चों को पढ़ाना नहीं छोड़े और नियमित रूप से पाबंदी के साथ निःस्वार्थ भाव से शिक्षा देने लगे। तब से लगातार निःशुल्क सेवा दे रहे हैं। इधर कोलकाता से टेक्नो इंडिया से बीटेक की डिग्री हासिल कर घर लौटे एकमात्र इंजीनियर पुत्र समर्पण पंडित भी माता-पिता से प्रेरित होकर इसी स्कूल में निःशुल्क पढ़ाने लगे। शिक्षक दंपति के परिवार की इस भावना का स्कूल और बच्चों को कितना फायदा मिल रहा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर किसी कारणवश यह सेवा बाधित हो जाती है, तो स्कूल में पठन-पाठन पर बुरा असर पड़ सकता है। इसके पीछे वजह यह है कि 12 शिक्षकों के सैंक्शन पोस्ट वाले इस विद्यालय में महज दो शिक्षिका ही कार्यरत है और इस साल जनवरी महीने के बाद 1 फरवरी को इन दो शिक्षिकाओं में से एक शिक्षिका रिटायर हो जाएंगी। इसका मतलब अब स्कूल के साढ़े पांच सौ छात्रों का भविष्य केवल एक शिक्षिका के भरोसे ही रह जाएगा। रिटायर शिक्षक सुनाम पंडित और शुभ्रा रानी दत्ता ने बताया कि स्कूल में अधिकतर बच्चे गरीब परिवार से आते हैं। इस विद्यालय में शिक्षकों के 12 पोस्ट सैंक्शन है। बताया कि साल 2017 से 2020 तक शिक्षकों के रिटायर होने का सिलसिला जारी रहा और इस दौरान आठ टीचर रिटायर हो गए। अब केवल दो शिक्षिका ही बच गए हैं। इंचार्ज के रूप में शिक्षिका लीना पंडित और अपर्णा विश्वास कार्यरत हैं। अपर्णा विश्वास इस साल फरवरी में रिटायर हो रही है।

बताया कि स्कूल में शिक्षकों की कमी से बच्चों के भविष्य पर संकट पैदा नहीं हो और नियमित रूप से शिक्षा मिले, इसी सोच से हमने रिटायरमेंट के बाद भी पढ़ाने का सिलसिला जारी रखा। शिक्षक सुनाम पंडित ने बताया कि वे बच्चों को इंग्लिश, मैथ और हिंदी पढ़ाते हैं। वहीं शुभ्रा रानी दत्ता बांग्ला और सोशल साइंस पढ़ातीं हैं। बताया कि बच्चों को स्कूली शिक्षा के साथ-साथ कौशल विकास की दिशा में भी आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। क्राफ्ट वर्क, बागवानी, सिलाई-कढ़ाई, लिफाफा बनाना आदि सीखाते हैं। इसके अलावा बच्चों को शैक्षणिक भ्रमण और पिकनिक के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए भी शिक्षा दी जाती है। नाटक का मंचन और डांस में बच्चे काफी रुचि रखते हैं। इसमें स्कूल के बच्चों ने रांची और दुमका में मेडल भी हासिल किया है। शिक्षक दंपति ने कहा कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो अंतिम सांस तक निःस्वार्थ भाव से सेवा देते रहेंगे। कहा कि विद्या का कभी भी क्षय नहीं हो सकता और इसे जितना बाटेंगे उतना ही बढ़ेगा। इतने सालों तक बच्चों को पढ़ाने के एवज में सैलरी मिली, लेकिन वह खुशी नहीं मिली,

जो पिछले कई सालों से निःशुल्क पढ़ाने से मिल रही है। इसी दौरान स्कूल के कुछ छात्रों से भी बातें हुई तो अपनी भाषा में बताया कि सर और मैडम के रिटर्न होने के बाद हम बच्चे काफी निराश हो गए थे। लेकिन रिटायर होने के बाद भी जब सर और मैडम स्कूल आते रहे, तो हमारे हौंसले बुलंद हो गए। इधर शिक्षक दंपति के इस सेवा भावना की समाज में काफी प्रशंसा हो रही है और लोग शिक्षक दंपति को सैल्यूट कर रहे हैं।

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