Homeपाकुड़इंसानियत, इल्म और तहजीब का मिसाल है प्रो. सैयद शबीहुल हसन
Maqsood Alam
(News Head)

इंसानियत, इल्म और तहजीब का मिसाल है प्रो. सैयद शबीहुल हसन

Gunjan Saha
(Desk Head)

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समाचार चक्र संवाददाता

पाकुड़। इतिहास के पन्नों में जब हम उन महान व्यक्तित्वों को खोजते हैं, जिन्होंने केवल अपने समय को ही रोशन नहीं किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सीख, संस्कार और रोशनी के दीप जलाए, तो ऐसे नामों में एक प्रमुख और प्रतिष्ठित नाम प्रो. सैयद शबीहुल हसन का भी उभरकर सामने आता है। यह नाम सिर्फ एक व्यक्ति का परिचय नहीं, बल्कि एक पूरी संस्कृति, एक परंपरा, एक जीवित मूल्य और एक उच्च मानवीय चरित्र का प्रतीक है। उनके व्यक्तित्व का हर पहलू इस बात का प्रमाण है कि असली शिक्षा डिग्रियों से नहीं, चरित्र से पहचानी जाती है और असली तहजीब शब्दों से नहीं, व्यवहार से झलकती है। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसका अस्तित्व स्वयं एक युग है प्रोफेसर साहब उन दुर्लभ और खुशनसीब लोगों में से हैं, जो अपनी विनम्रता, सादगी, ईमानदारी, शालीनता और गहरे मानवीय गुणों से लोगों के दिलों में वह जगह बना लेते हैं, जिसे वक्त की धूल कभी धुंधला नहीं कर पाती। वे इंसानियत को पढ़ाते नहीं, उसे जीते हैं। वे मोहब्बत का पाठ पढ़ाते नहीं, उसे बांटते हैं। वे चरित्र पर भाषण नहीं देते, स्वयं चरित्र बन जाते हैं। उनकी सरलता, उनकी नर्मी, उनका आदर और उनकी शख्सियत का नूर यह सब उस खानदानी विरासत का हिस्सा है, जिसने ज्ञान, संस्कार और प्रेम को जीवन का मार्ग बनाया। एक रोशन खानदान की विरासत प्रोफेसर साहब का संबंध झारखंड के पाकुड़ के उस प्रतिष्ठित परिवार से है, जिसकी नींव मौलवी सैयद हसन साहब ने रखी थी। वे केवल सरकारी स्कूल के हेडमास्टर नहीं थे, बल्कि पूरे पाकुड़ के मौलवी साहब बन गए ज्ञान, अनुशासन, सौम्यता और मानवता से भरे हुए व्यक्तित्व। उनके तीनों पुत्र अपने-अपने क्षेत्र में प्रकाश-स्तंभ बने प्रो. सैयद जफीरुल हसन (पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग, गोड्डा कॉलेज) प्रो. सैयद मजफ्फरुल हसन (अपनी विद्वता और गंभीरता के लिए प्रसिद्ध) और सबसे छोट प्रो. सैयद शबीहुल हसन, उर्दू विभागाध्यक्ष, बीएसके कॉलेज, बरहरवा। इसी महान विरासत की झलक प्रोफेसर साहब की बातचीत, दृष्टि, निर्णय और पूर्ण व्यक्तित्व में दिखाई देती है। शिक्षा, साहित्य और मानव निर्माण उनकी पहचान बरहुआ कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में उन्होंने शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि विद्यार्थियों के चरित्र-निर्माण को प्राथमिकता दी। उनकी लिखी रचनाएं चाहे साहित्य हो, समाज, शिक्षा या इस्लाम हर लेख पाठक के दिल में सीधे उतर जाता है। साल 2010 से 2023 तक उनके अनेक लेख उर्दू और हिन्दी अखबारों में प्रकाशित होते रहे। हर लेख अपने भीतर एक नई रोशनी, नई संवेदनशीलता और नई प्रेरणा लेकर आता था। आज भले ही पत्नी की अस्वस्थता के कारण उनका कलम शांत है, लेकिन उनकी रोशनी उनके विद्यार्थियों के आचरण में, उनके चाहने वालों की दुआओं में और उनके हर मुरीद के दिल में आज भी जीवित है। पाकुड़ का वह भूमि जहां प्रोफेसर साहब ने बरसों बिताए, वहां आज भी उनके प्रति लोग प्रेम और सम्मान को संजोकर रखा है। लोग आज वर्तमान में दूसरे शहरों में रहने वाले प्रोफेसर साहब की कमी को जरुर महसूस करते हैं। उनके अपने रिश्तेदार हो या चाहने जानने वाले हो, जब भी पाकुड़ आते हैं, उनकी कमी को महसूस करते हैं। घर वही, गली वही, माहौल वही, लेकिन एक गहरी कमी. प्रोफेसर साहब की अनुपस्थिति लगती है। लेकिन जैसे ही लोगों को मालूम पड़ता है, उन पर पूरे मोहल्ले का प्यार जैसे उमड़ पड़ता है। ऐसा लगता है जैसे प्रोफेसर साहब खुद उनके साथ चल रहे हों। हर घर से बुलावा, हर जबान पर सम्मान, हर दिल में स्नेह यह सब उस प्यार की कमाई है जो शब्दों से नहीं, व्यवहार और व्यक्तित्व से अर्जित होता है। इंसानियत जो उन्होंने बोलकर नहीं, जीकर दिखाई। उनकी बातों में कटाक्ष नहीं, प्रेम होता है। उनके सुझावों में कठोरता नहीं, बुद्धि और अनुभव का निचोड़ होता है। उनके स्वभाव में दिखावा नहीं, एक सच्ची सरलता होती है। उनका पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि महानता पद और ऊंचाइयों से नहीं, व्यवहार और मानवीयता से प्राप्त होती है। आज लोग उन्हें याद करते हैं और दिल से उठी दुआएं देते है, ईश्वर प्रोफेसर साहब की पत्नी को पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करें। उनकी हर पीड़ा दूर करें। प्रोफेसर साहब का साया हमेशा सलामत रखें। उनकी जिंदगी में खुशियां, सहजता, रहमत और बरकतें भर दें। लोग कहते हैं प्रोफेसर साहब आप हमारे लिए केवल एक नाम नहीं एक दिशा, एक मार्गदर्शन, एक रोशनी हैं।आपकी उम्र रोशनी, प्रेम और सम्मान से भरी रहे, क्योंकि आप स्वयं एक रोशनी हैं।

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