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Maqsood Alam
(News Head)

नब्बे प्रतिशत अनुदान पर बांटी गईं बकरियां क्या बन रहे हैं वैकल्पिक आय का स्रोत?

आर्थिक सशक्तिकरण की इस योजना की धरातलीय सच्चाई की होनी चाहिए जांच

Gunjan Saha
(Desk Head)

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ललन झा@समाचार चक्र
अमड़ापाड़ा। प्रखंड के अनूसूचित जनजाति व जाति के चिन्हित लाभुकों के बीच पशुपालन विभाग द्वारा नब्बे प्रतिशत अनुदान पर बकरी व बकरा उपलब्ध कराने का कार्य यहां भी होता रहा है। इसी के तहत गुरुवार को प्रथमवर्गीय पशु चिकित्सालय के प्रांगण में जड़ाकी पंचायत के गोगाजोर के दो लाभुकों को दस-दस बकरियां दी गईं। इनमें दो बकरे और आठ बकरियां शामिल रहीं। उल्लेखनीय है कि भारी अनुदान पर इस समुदाय के निहायत जरूरतममंदों को बकरी दिए जाने का उद्देश्य उन्हें जीविकोपार्जन का एक वैकल्पिक स्रोत मुहैया कराना है। बकरी पालन के जरिए उनमें आर्थिक सशक्तिकरण लाना है। अबतक पिछले कई वित्तीय-वर्षों पर यदि गौर किया जाय तो प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न गांवों में अबतक एक अनुमानित आंकड़े के मुताबिक लाखों-करोड़ों की सरकारी राशि का पशु इनके बीच उपलब्ध कराया जा चुका है। किन्तु, क्या सरकार का यह उद्देश्य यहां फलित हो रहा है ? क्या पशुपालन विभाग के जरिए बांटे गए पशुओं से लाभुकों के परिवारों में आर्थिक समृद्धि आई है अथवा आ रही है ? क्या यह अनुदान आदिवासी व हरिजन परिवारों के बीच वैकल्पिक रोजगार का साधन या अतिरिक्त आय का जरिया बना है ? क्या इस मामले बिचौलियों की भूमिका नहीं है ? क्या सरकार के इस सोच को जमीन पर ईमानदारी से आकार मिल रहा है ? क्या यह योजना कमीशनखोरी से अछूता है ? ऐसे अन्यान्य तमाम सवाल भी इस योजना की साख पर खड़े हो जाते हैं जो व्यापक, ईमानदार व शख्त जांच के विषय हैं ।

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प्रति लाभुक 44 हजार रुपए के बनते हैं इस्टीमेट कॉस्ट

प्रखंड पशुपालन पदादिकारी डॉ सुशील तिग्गा ने गुरुवार को दो लाभुकों के बीच बकरी वितरण की पुष्टि करते हुए कहा कि एक लाभुक पर विभाग चौवालीस हजार रुपए खर्च कर रही है। उपरोक्त राशि का मात्र दस प्रातिशत यानि चार हजार रुपए ही लाभुक को चुकता करने पड़ते हैं। सभी पशु बीमित होते हैं। पशु की अचानक मौत पर नियमानुसार लाभुक को जानकारी देना चाहिए।

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