अबुल काशिम@समाचार चक्र
पाकुड़। दर्शना शिखर (वाणी) महज पांच साल की रही होगी, जब मां की ममता साथ छोड़ गई। तीन बहनों में दूसरी, दर्शना शिखर को घर में सब प्यार से वाणी बुलाते हैं। मां के गुजरने के बाद सब कुछ रहते हुए भी वाणी खुद को अकेली महसूस करती थी। लेकिन घर की समझदार बच्ची भी थी, तो मां को खोने का गम किसी को जल्दी महसूस भी होने नहीं देती थी। आंखों से चुप-चुप के आंसू पौंछती और मां की सिखाई बातों और संस्कारों से हौंसला लेकर खुद को संभालती। एक छोटी सी बच्ची, जिसके लिए अभी मां का साथ महज जरुरत ही नहीं, बल्कि मां ही जीने का सहारा था। जरा सोचिए इस उम्र में मां का साथ छूट जाना किसी बच्ची के लिए कितना पीड़ादायक होगा। इन सबके बीच दर्शना मां के सपनों को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। मां के गुजरने के बाद पिता कार्तिक कुमार (वरिष्ठ पत्रकार) के हिम्मत ने तो दर्शाना को नई ऊर्जा दे दी। मां का सपना था कि दर्शना पढ़ लिख कर आगे बढ़े और अपना बेहतर भविष्य बनाएं। पिता कार्तिक कुमार भी यही चाहते थे। पत्नी के निधन के बाद कार्तिक कुमार भी खुद टूट सा गए। लेकिन उन्होंने भी हिम्मत नहीं हारी और तीनों बेटियों को एक नया माहौल देने का हर संभव प्रयास किया। बेटियों को मां की कमी का एहसास ना हो, इसके लिए उन्होंने परवरिश में कोई कमी नहीं होने दी। एक पिता का धर्म और मां की ममता का हमेशा ख्याल रखा। पढ़ाई से लेकर हर जरूरत को पूरा करने का प्रयास किया। एक ऐसा माहौल दिया, जिसमें तीनों बेटियां हर पल पिता की आंखों में मां की ममता और उनके सपनों को ही पाया। इन्हीं बातों ने दर्शाना को अंदर से बेहद मजबूत बना दिया। अपनी मां के सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत की। पिता कार्तिक कुमार के हौंसलों से आगे बढ़ती गई। यहां बताना जरूरी होगा कि कार्तिक कुमार ने अपने जीवन में काफी उतार चढ़ाव देखे। पत्रकारिता और निजी जीवन में भी उन्हें काफी संघर्षों से गुजरना पड़ा। लेकिन किसी भी पल हिम्मत नहीं हारी। पिता से प्रेरणा लेकर दर्शाना ने आज कामयाबी की एक ऐसी सीढ़ी पर कदम रख दिया है, जिसमें मां के सपने पूरे होते दिख रहे हैं। दरअसल दर्शना कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (सीएलएटी) के एग्जाम में बड़ी सफलता हासिल कर ली है।
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दर्शना शिखर की यह सफलता सिर्फ एक कठिन परीक्षा से गुजर कर सफलता पाने तक की कहानी मात्र नहीं है, बल्कि यह अनुशासन, परिश्रम और आत्मविश्वास की मिसाल भी है। जिसे अपने पिता और मां से सीखी है। दर्शना बताती है कि उनकी सफलता के पीछे मां का संस्कार, पिता की प्रेरणा है। करीब 15 घंटे की रोजाना स्टडी और शिक्षकों से मिलते हौंसले भी कामयाबी का अहम हिस्सा है। बता दें कि दर्शना के दादाजी और कार्तिक कुमार के पिता स्वर्गीय प्रह्लाद रजक डीडीसी के पद पर थे। उनके एक और दादाजी शैलेंद्र रजक आरटीओ दुमका और चाचा जी पुष्पक रजक एसडीएम रैंक में रांची में पदस्थापित है। दर्शना अपने दादाजी और चाचा जी को भी खास तौर पर आदर्श मानती हैं। जिनकी मेहनत और कामयाबी ने दर्शाना को काफी प्रभावित किया। इधर पिता कार्तिक कुमार ने कहा कि एक पिता के लिए बेटी की सफलता से ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है। बेटी ने न सिर्फ मेरे परिवार का, बल्कि पाकुड़ जिले का नाम रोशन किया है। मुझे अपनी बेटी पर गर्व है। उन्होंने कहा कि बेटी की यह सफलता दूसरे बच्चों के लिए भी प्रेरणा है। पाकुड़ जैसे पिछड़े जिले से निकल कर सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने को पूरा किया जा सकता है, इस बात को दर्शना ने साबित कर दिखाया है। उन्होंने कहा कि प्रतिभा किसी भौगोलिक सीमा की मोहताज नहीं होती। अगर सही मार्गदर्शन मिले तो कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास से हर लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
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