अबुल काशिम@समाचार चक्र
पाकुड़। जिस गरीब दंपत्ति ने गांव में सरकारी स्कूल में खुलने और पढ़ाई शुरू कराने में अहम भूमिका निभाया, भवन निर्माण के लिए सरकार को लाखों की जमीन दान में दे दी, आज वहीं दंपत्ति सिस्टम के आगे घुटने टेक झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं। गरीबी की मार झेल रहे बुजुर्ग दंपति एक अदद सरकारी आवास के लिए दौड़ते दौड़ते थक चुकी हैं। हालत यह है कि घर के अभाव में जवान बेटों की शादी तक नहीं करा पा रहे हैं। यह कोई कहानी नहीं, बल्कि सदर प्रखंड के नया चांदपुर गांव के रहने वाले लक्ष्मण मंडल और आलो मंडल की जीवनी से जुड़ी सच्चाई है। दरअसल लक्ष्मण मंडल और आलो मंडल की तीन बेटियां और दो बेटे हैं। इनमें 30 साल की दुलाली मंडल, 26 साल की वैजयंती मंडल, 20 साल की ब्यूटी मंडल, 24 साल का दुलाल मंडल और 18 साल का बापी मंडल शामिल है। दंपत्ति की तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। जबकि दो बेटे दुलाल और बापी की शादी नहीं हुई है। अपने दोनों बेटों के साथ बड़ी मुश्किल से एक ही झोपड़ी में रह रहे हैं। दंपत्ति का कहना है कि सरकारी आवास के लिए पंचायत स्तर पर कई बार फरियाद लेकर गए। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। थक हार कर किसी को भी अपना दुखड़ा सुनाने के बजाय चुप बैठ गई हैं। जिस झोपड़ी में रह रहे हैं उसमें रात गुजारना मुश्किल भरा होता है। बारिश के दिनों में पानी टपकता है, तो सर्दियों में शीतलहरी से काफी परेशानी होती है। गर्मी में तो झोपड़ी के नीचे रहना बहुत ही तकलीफ भरा होता है। अपना दुखड़ा सुनाते हुए दंपत्ति की आंखें भर आती है।दोनों बीच-बीच में आंसू पोंछती और रुंधे गले में बस यही कहते कि काश… एक पक्का मकान मिल जाता। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में किसी तरह भरण पोषण करने वाले दंपत्ति की सुधि लेने वाला कोई नहीं है। इसी बात का अफसोस जाहिर करते हुए दंपत्ति ने कहा कि हमने स्कूल को जमीन दान दी, इसलिए सरकार से आवास नहीं मांग रहे हैं। बल्कि हम आवास बनाने में सक्षम नहीं है, इसलिए सरकार से एक अदद आवास की मांग कर रहे हैं। दंपत्ति ने साफ तौर पर कहा कि स्कूल को दान में दिए जमीन का हमें जरा सा भी मलाल नहीं है, बल्कि मुझे इस बात की खुशी है कि आज उस स्कूल में गांव के सैंकड़ों बच्चें शिक्षा ले रहे हैं। प्रशासन से गुजारिश है कि हमारी हालत को देखते हुए सरकारी आवास दिलाने की मेहरबानी करें।
साल 2012 में जमीन दान कर पेश किया था मिसाल
लक्ष्मण मंडल और आलो मंडल ने बताया कि साल 2012 तक गांव में कोई भी स्कूल नहीं थी। यहां के बच्चों को पढ़ाई करने दूसरे गांव में जाना पड़ता था। साल 2012 में जब सरकार से स्कूल की स्वीकृति मिली, तब गांव में जमीन नहीं मिल रही थी। लक्ष्मण मंडल ने कहा कि गांव के बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए मैंने अपने 14 कट्ठा जमीन में से चार कट्ठा जमीन स्कूल को दान कर दिया। लक्ष्मण मंडल ने बताया कि मेरी पत्नी आलो मंडल ने मुझे जमीन दान देने में काफी उत्साहित किया।