समाचार चक्र संवाददाता
पाकुड़ । अपने लिए तो सब जीते हैं, कभी औरों के लिए जी कर देखो। अपनी खुशियों में सब खुश होते हैं, औरों को खुश करके देखो। मत करो तेरा मेरा, मिलजुल कर प्यार से रहना परंपरा है हमारी, कभी जरुरतमंदों को गले लगा, अपना बनाकर देखो। ये पंक्तियां युवा समाजसेवी अजहर इस्लाम के लिए है। जिन्होंने गरीब मजबूर बेसहारों की परेशानियों को अपनी परेशानी समझा और तन मन धन से मदद पहुंचाया। अजहर इस्लाम की समाजसेवा दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया है। कोरोना काल में जब लोग घरों में कैद होकर अपनी जान बचा रहे थे, लोगों की मदद करने अजहर सड़क पर उतर आए। प्रशासन को आम लोगों के लिए मास्क और सैनिटाइजर उपलब्ध कराया। उस वक्त बहुत ही कम लोगों को मास्क और सैनिटाइजर की जानकारी थी। पहली बार स्वास्थ्य विभाग को मास्क और सैनिटाइजर मुहैया कराया। घरों में भूखे प्यासे रहकर दिन गुजारने वालों के लिए मसीहा बने। पैतृक गांव जानकीनगर सहित दर्जनों गांवों के हजारों परिवारों को राहत सामग्री मुहैया कराया। अजहर ने अपने भाई मजहर के साथ मिलकर पिता अली अकबर के नक्शे कदम पर चलते हुए समाजसेवा के सफर पर निकल पड़े। कोरोना काल में सुखा राशन में चावल, आटा, दाल चीनी, आलू, तेल मसाले का पैकेट बना बना कर गरीबों को बांटा। अपने घर पर ही नहीं, बल्कि जरुरतमंदों के घरों तक वाहनों से राशन पहुंचाया। अजहर इस्लाम और मजहर इस्लाम का समाजसेवा यही तक सीमित नहीं रहा, बल्कि निरंतर चलता गया। हाल ही में सदर प्रखंड के गंधाईपुर गांव में अग्नि पीड़ित पचास परिवारों को दोनों हाथों से मदद किया। ईद की खुशी में शामिल किया। युवा समाजसेवी के रूप में अपनी छवि बनाने वाले अजहर इस्लाम और मजहर इस्लाम की चर्चा आम हो गई है। अजहर इस्लाम से इन्हीं मुद्दों पर प्रभात मंत्र की बातचीत हुई। पेश है उनसे हुई बातचीत का खास अंश…
प्रश्न: आप समाजसेवा में कैसे आए?
जवाब: दिल्ली में पढ़ाई पूरी कर घर आए और पिताजी के साथ बिजनेस में हाथ बंटाने लगे। घर और कार्यस्थल पर आने वाले जरुरतमंदों की परेशानियों ने मुझे अंदर से झकझोर दिया। उन्हें मदद की इच्छा जागने लगी। मैं वैसे लोगों से घुल मिलने लगा। पिताजी के साथ मैं भी मदद करता गया। धीरे-धीरे यह मेरी दिनचर्या में शामिल होने लगा। किसी भी माध्यम से सूचना मिलते ही मदद के लिए पहुंचना या घर बुलाकर मदद करना आदत बन गया। इसी तरह समाजसेवा में दिलचस्पी बढ़ गई।
प्रश्न: आपको समाजसेवा की प्रेरणा किससे मिली।
जवाब: मुझे समाजसेवा की प्रेरणा पिताजी (अली अकबर) से मिली है। पिताजी का बचपन गरीबी में गुजरा है। गरीबी को नजदीक से देखा है। पिताजी हमेशा कहा करते हैं कि दूसरों का मददगार बनो। तभी जीवन सफल होगा। दूसरों की मदद करने से एक अजीब सा सुकून मिलता है। अजीब सी खुशी मिलती है।
प्रश्न: आगे चलकर कुछ और बेहतर करना चाहेंगे।
जवाब: अल्लाह से दुआ है मुझे दूसरों का मददगार बनने का अवसर मिलता रहे। आगे और बेहतर कर सकूं, इसकी कोशिश रहेगी। अन्य माध्यम से भी गरीबों का मदद करने का अवसर मिले।
