समाचार चक्र संवाददाता
पाकुड़– एक सवाल जो हमारे गरीब तबके के विद्यार्थियों के मन में और उनके अभिभावकों के मन में सवाल घर कर रहा है की आखिर क्यों भारतीय शिक्षा की नई प्रणाली अर्थ तंत्र का पूर्णत शिकार होती जा रही है शिक्षा व्यवस्था का निजीकरण, औद्योगिकरण और व्यवसायीकरण होता जा रहा है, भारतीय जनता का मौलिक अधिकार है शिक्षा…. मगर कहीं न कहीं धीरे-धीरे इसकी मौलिकता खत्म होती जा रही है, सभी प्रकार के शिक्षण संस्थान संवेदनहीन होते जा रहे हैं।हाल के विगत कुछ वर्षों में शिक्षा व्यवस्था का बड़ा बाजार भारत में खड़ा हो गया है..
उपरोक्त बातें डॉक्टर राकेश कुमार दास ने कही। उन्होंने कहा मूल रूप से व्यक्ति और व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास शिक्षा पर आधारित होता है जिससे सामाजिक संरचना का उत्थान और किसी देश के विकास में मुख्य भूमिका अदा करते हुए विकसित समाज पैदा करता है। भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग गरीबों और वंचितों का है, जिसमें जहां बेशक बहुत प्रतिभाएं हैं मगर वह इसलिए आगे नहीं आ पाते हैं क्योंकि गैर बराबरी आर्थिक स्थिति और महंगी शिक्षा व्यवस्था के साथ कदमताल कर सके… और प्रतिभाएं धीरे धीरे धूमिल हो जाती है….और आगे बढ़ने की क्षमता दम तोड़ देती हैं। केंद्र और राज्य सरकारों को शिक्षा प्रणाली की ओर काफी संवेदनशील होना चाहिए, एक उचित रोड मैप बनाना चाहिए और कमोबेश सम्पूर्ण शिक्षा शुल्कों को, किताबों को निशुल्क कैटेगरी में डालना चाहिए, जहां अमीर से लेकर गरीब तक सभी वर्ग के व्यक्ति यह कह सकते हैं कि कम आय का व्यक्ति भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं, और अपनी योग्यता के आधार पर अपने कार्य क्षेत्र का चुनाव कर सके और अपनी कार्य योग्यता से देश और समाज का विकास कर सकें और अपनी योग्यता का उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकें। भारत के मौजूदा हालात में मध्यमवर्गीय वर्ग और निम्न वर्गीय वर्ग महंगी हो रहे शिक्षण संस्थानों में बच्चों का दाखिला नहीं करवा सकते हैं, वह केवल उच्च आर्थिक वर्ग के शिक्षा का हिस्सा बनता जा रहा है… धन के अभाव में बहुत प्रकार की प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं…. महंगी शिक्षा और महंगे कोचिंग संस्थान बाजार भारत में पूर्ण व्यवस्थित है, ऐसे बाजारों में शिक्षा खरीदना सब कुछ दांव लगाने के बराबर साबित हो रहा है। कई अभिभावक अपने बच्चों की महंगी शिक्षा को लेकर इतने चिंतित रहते हैं कि वह अपनी सारी जमापूंजी इन्हीं संस्थानों के पास गवाना पड़ रहा है। शिक्षण संस्थान और यूनिवर्सिटीज अपना अस्तित्व और विश्वास खोती जा रही है, इसका सबसे बड़ा कारण कि उसको चलाने वाले मंत्री, अधिकारी और कर्मचारी खुद अपने बच्चों को ऐसे संस्थानों में दाखिला करवाना नहीं चाहते हैं और कतराते नजर आते हैं…. जबकि इनलोगों को चाहिए की व्यवस्था में जुड़े लोग जिस जगह, जिस वार्ड, जिस शहर से आते हैं उसी में उनके बच्चों का दाखिला होना चाहिए… तब निश्चित ही शिक्षा व्यवस्था ताकतवर होगी और बराबर शिक्षा व्यवस्था संचालन हो सकेगा। आशा करता हूं कि कोई सरकार ऐसी हो जो सभी शिक्षण संस्थानों के बढ़ते शुल्क,लूट तंत्र पर और महंगे हो रहे बच्चों की पुस्तकों और कॉपियों पर अंकुश लगाने का कार्य करेगी शिक्षा को सस्ता मौलिक अधिकार बनाएगी… शिक्षा को बाजार बाजारू और बेआबरू होने नहीं देगी, किताब, कॉपी, कलम, पेंसिल, कागज, कंप्यूटर्स इत्यादि जितने भी शैक्षणिक इंस्ट्रूमेंट है, इन पर जीएसटी कम हो और यह सस्ती हो, ऐसी भी प्रयास राज्य सरकारो और केंद्र सरकारों को मूल रूप से करनी चाहिए। इन सभी चीजों पर जीएसटी लगाकर कहीं ना कहीं आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए एक समस्या खड़ी हो गई है, साथ सरकारी विद्यालयों, सरकारी विश्वविद्यालयों को नामांकन और परीक्षा शुल्क के बारे में विचार करना चाहिए जिससे लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन ना हो और मानवीय मूल्यों का संरक्षण हो सके।