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Maqsood Alam
(News Head)

कोयला निकला,लेकिन जिंदगी की जमीन खिसक गई…

पचुवाड़ा में विस्थापितों के घर पहुंचे बाबूलाल, बोले- पुनर्वास सिर्फ मकान देने का नाम नहीं,चार पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करना होगा

ललन झा की स्पेशल रिपोर्ट

अमड़ापाड़ा। कभी इन्हीं गांवों की जमीन पर खेत लहलहाते थे। घरों के आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं। जमीन सिर्फ मिट्टी का टुकड़ा नहीं थी, बल्कि परिवार की रोजी-रोटी, पहचान और आने वाली पीढ़ियों की उम्मीद थी। आज उसी जमीन की जगह कोयले की खदानें हैं और विस्थापित परिवारों के हिस्से में रह गए हैं कुछ मकान और कई सवाल।शुक्रवार को सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री सह नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी जब पचुवाड़ा नॉर्थ और सेंट्रल कोल परियोजना के चिलगो, बिशनपुर, कठालडीह समेत विभिन्न गांवों में पहुंचे तो विस्थापितों ने उनके सामने अपने दर्द की पूरी कहानी रखी। किसी ने रोजगार का सवाल उठाया तो किसी ने बच्चों की पढ़ाई का। किसी ने छोटे पड़ते मकानों की चिंता बताई तो किसी ने आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को लेकर सवाल किया।बाबूलाल मरांडी ने चिलगो में विस्थापित 118 परिवारों के लिए बनाई गई कॉलोनी का जायजा लिया। उन्होंने वहां रह रहे लोगों से सीधे बातचीत कर उनकी सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और भौगोलिक स्थिति को समझने की कोशिश की।

हमारी जमीन चली गई,अब बच्चों का भविष्य किस भरोसे

विस्थापित परिवारों ने बताया कि उनकी जमीनें सरकार अथवा संबंधित कंपनी द्वारा अधिग्रहित कर ली गई हैं। जिस जमीन से पीढ़ियों तक परिवारों का पेट पलता था, वह अब कोयले की खदानों में बदल चुकी है।लोगों ने कहा कि जमीन चली गई, लेकिन उसके बदले ऐसा स्थायी रोजगार नहीं मिला, जिससे आने वाली पीढ़ियों का जीवन सुरक्षित हो सके। रोजगार के नाम पर औपचारिकता पूरी किए जाने की शिकायत भी विस्थापितों ने की। उनका कहना था कि चार सौ रुपए प्रतिदिन की आय के बराबर भी विधिवत रोजगार उपलब्ध नहीं कराया गया।सबसे बड़ी चिंता मकानों को लेकर सामने आई। विस्थापितों ने बताया कि प्रत्येक परिवार को मकान के लिए सात डिसमिल जमीन दी गई है, लेकिन संयुक्त परिवारों के लिए यह जगह पर्याप्त नहीं है।एक परिवार में आज माता-पिता और उनके छोटे बच्चे साथ रह रहे हैं। लेकिन जब यही बच्चे बड़े होकर शादी करेंगे और उनका अपना परिवार होगा, तब उसी छोटे से मकान में वे कैसे रहेंगे? यही सवाल विस्थापितों को आज से ही परेशान कर रहा है।

मकान आज है, लेकिन अगली पीढ़ी कहां रहेगी

विस्थापितों की सबसे मार्मिक चिंता यही थी कि मौजूदा पुनर्वास व्यवस्था शायद एक-दो पीढ़ियों के बाद उनके लिए पर्याप्त नहीं होगी।बच्चों की शिक्षा को लेकर भी लोगों ने अपनी परेशानी बताई। उनका कहना था कि खनन शुरू हुए छह-सात वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन बच्चों के लिए बेहतर शिक्षण संस्थान की समुचित व्यवस्था नहीं हो सकी है।
यानी जमीन गई, रोजगार का भरोसा कमजोर रहा और बच्चों के भविष्य को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है।बाबूलाल मरांडी ने विस्थापितों की बातें गंभीरता से सुनीं। उन्होंने कहा कि पुनर्वास का अर्थ केवल किसी परिवार को एक मकान दे देना नहीं है। सरकार को आने वाली चार पीढ़ियों को ध्यान में रखकर योजना बनानी चाहिए।

चार पीढ़ियों का भविष्य सोचकर करना होगा पुनर्वास

बाबूलाल मरांडी ने कहा कि सरकार के पास विस्थापित परिवारों के लिए आने वाले सौ वर्षों की सोच होनी चाहिए। उनके अनुसार, जब किसी परिवार की जमीन चली जाती है तो उसके साथ केवल वर्तमान नहीं, बल्कि उसकी अगली कई पीढ़ियों का भविष्य प्रभावित होता है।उन्होंने कहा कि झारखंड में आदिवासी आबादी का कम होना भी चिंता का विषय है। यदि लोगों के पास रोटी, कपड़ा और मकान के साथ सम्मानजनक जीवन जीने का साधन नहीं रहेगा तो वे पलायन करने को मजबूर होंगे।उन्होंने कहा कि लोग अपनी जमीन और जड़ों से कटकर ‘जैसे-तैसे जिएंगे और फिर मर जाएंगे’, यह किसी भी सरकार की विकास नीति की सफलता नहीं हो सकती।

2012 में भी उठाई थी विस्थापितों की आवाज

पचुवाड़ा का मुद्दा बाबूलाल मरांडी के लिए नया नहीं है। वर्ष 2012 में भी उन्होंने तत्कालीन सरकार और पैनम कोल माइंस की नीतियों के खिलाफ विस्थापितों और प्रभावित परिवारों के हक में 22 दिनों तक धरना दिया था।उस आंदोलन के बाद पैनम कोल माइंस को अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ा था।एक दशक से अधिक समय बाद बाबूलाल मरांडी का फिर इन्हीं विस्थापित इलाकों में पहुंचना कई पुराने सवालों को सामने ले आया है—क्या विकास की कीमत सिर्फ विस्थापित परिवार ही चुकाएंगे? क्या उनकी जमीन के बदले उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित होगा?

हक नहीं मिला तो भाजपा आंदोलन करेगी

पत्रकारों के सवाल पर बाबूलाल मरांडी ने कहा कि वे कोयला विस्थापितों के हक की लड़ाई लड़ेंगे। उनकी आवाज सरकार तक पहुंचाएंगे और सरकार को विस्थापितों को उचित अधिकार देना होगा।उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि विस्थापितों को उनका हक नहीं मिला तो भाजपा आंदोलन से पीछे नहीं हटेगी।शुक्रवार को पचुवाड़ा की कोयला खदानों के बीच खड़े विस्थापित परिवारों की आंखों में सिर्फ आज की परेशानी नहीं थी। उनके सवाल आने वाले कल के थे। सवाल यह नहीं था कि आज उन्हें छत मिली या नहीं—सवाल यह था कि जिस जमीन ने पीढ़ियों को पाला, उसके चले जाने के बाद अगली पीढ़ियों को कौन संभालेगा.कोयले से निकलने वाली चमक के पीछे विस्थापितों की जिंदगी का यही अंधेरा अब सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने खड़ा है।

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