मक़सूद आलम
कोटालपोखर-कुछ जगहें केवल ज़मीन का टुकड़ा नहीं होतीं,वे समय की जीवित किताब होती हैं।उनके पत्थर बोलते नहीं, लेकिन सदियों की कहानियाँ सुनाते हैं। झारखंड के साहिबगंज जिले का कोटालपोखर भी ऐसी ही एक ऐतिहासिक धरती है, जहाँ हर सुबह शाही मस्जिद की अज़ान गूंजती है और हर शाम खामोश खड़ी एक मीनार अतीत के सुनहरे दिनों को याद करती नज़र आती है।जब आप कोटालपोखर की उस ऐतिहासिक धरोहर के पास पहुँचते हैं,तो सबसे पहले आपकी नज़र घने पेड़ों के बीच खड़ी एक पुरानी ‘मेमोरियल पिलर’ पर जाती है।वह न बोलती है,न शिकायत करती है,लेकिन उसकी ख़ामोशी में इतिहास का ऐसा दर्द छिपा है,जिसे महसूस किया जा सकता है।साल 1933 में तत्कालीन जमींदार मोहम्मद इस्माईल चौधरी द्वारा निर्मित यह स्मारक आज भी अपने सीने पर इतिहास के कई अध्याय संजोए हुए है। संगमरमर की पट्टिकाओं पर उकेरे गए नाम समय के साथ धुंधले पड़ चुके हैं,लेकिन उनकी गरिमा आज भी वैसी ही है।उखड़ती दीवारें,काई से ढके पत्थर और फीके पड़ते शिलालेख मानो आने-जाने वालों से एक ही सवाल पूछते हैं“क्या हमारी विरासत को अब याद रखने वाला कोई नहीं बचा?”इसी स्मारक से कुछ कदम की दूरी पर खड़ी है कोटालपोखर की भव्य शाही मस्जिद। इसकी ऊँची मीनारें, विशाल गुंबद और बेमिसाल नक्काशी आज भी बीते दौर की स्थापत्य कला का शानदार उदाहरण हैं।लेकिन इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी जीवंतता है। पाँचों वक्त यहाँ अज़ान गूंजती है, नमाज़ अदा होती है और सदियों पुरानी यह इमारत आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई है।यह दृश्य अपने आप में अद्भुत है,एक ओर खामोश मीनार,जो बीते हुए कल की कहानी कहती है, दूसरी ओर शाही मस्जिद,जहाँ हर अज़ान वर्तमान को जीवंत बनाए रखती है। यहाँ इतिहास और आस्था एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े दिखाई देते हैं।इस विरासत की सबसे अनोखी बात यह है कि इसके ठीक बगल में कोटालपोखर प्लस टू उच्च विद्यालय है।रोज़ाना सैकड़ों बच्चे उसी इतिहास की छाया में पढ़ाई करते हैं,जिसके बारे में शायद उन्हें पूरी जानकारी भी नहीं है। थोड़ी ही दूरी पर खेल का मैदान है,जहाँ बच्चे और युवा क्रिकेट तथा फुटबॉल खेलते हुए अपने भविष्य के सपने बुनते हैं।एक तरफ़ नई पीढ़ी भविष्य की ओर बढ़ रही है,तो दूसरी तरफ़ उसी के सामने अतीत अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
दुर्भाग्य की बात यह है कि इतनी महत्वपूर्ण धरोहर आज उपेक्षा का शिकार है।स्मारक के चारों ओर उगी झाड़ियाँ, फैली गंदगी और नियमित सफ़ाई का अभाव इसकी सुंदरता पर धूल की परत बनकर जम गया है।चारदीवारी के भीतर कैद यह विरासत आज लोगों की नज़रों से भी दूर होती जा रही है।मीनार तक पहुँचना भी आसान नहीं रह गया है।यह केवल एक स्मारक की उपेक्षा नहीं,बल्कि हमारी ऐतिहासिक चेतना की परीक्षा है।यदि आज भी इसके संरक्षण की दिशा में ठोस पहल नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस धरोहर को केवल पुरानी तस्वीरों या किताबों में ही देख पाएँगी।कोटालपोखर की यह ऐतिहासिक विरासत हमें याद दिलाती है कि इतिहास केवल तिथियों और किताबों में नहीं बसता। वह पत्थरों की दरारों में, मीनारों की ख़ामोशी में,अज़ान की गूंज में और लोगों की स्मृतियों में जीवित रहता है।आज ज़रूरत केवल इस विरासत को देखने की नहीं,बल्कि इसे सहेजने की है।यदि समाज और प्रशासन मिलकर इस स्मारक और शाही मस्जिद के आसपास नियमित सफ़ाई,सौंदर्यीकरण, सूचना-पट्ट और संरक्षण की व्यवस्था करें,तो कोटालपोखर न केवल अपनी पहचान बचाएगा, बल्कि झारखंड के प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में भी अपना स्थान बना सकता है।क्योंकि जब विरासत बचती है, तभी इतिहास बोलता है… और जब इतिहास बोलता है,तब एक समाज अपनी पहचान को कभी खोने नहीं देता।

