समाचार चक्र संवाददाता
पाकुड़। नगर परिषद क्षेत्र में करीब 15 दिनों तक ठप रही शहरी पेयजलापूर्ति योजना आखिरकार बहाल हो गई। इससे जहां आम लोगों ने राहत की सांस ली, वहीं नगर परिषद की राजनीति में नया मोड़ आ गया। जलापूर्ति शुरू होते ही नगर परिषद के निर्वाचित जनप्रतिनिधि दो अलग-अलग गुटों में बंटे नजर आए। दोनों गुटों ने अलग-अलग समय पर पंप हाउस और इंटेकवेल का दौरा किया और अपनी-अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं। इसके बाद पूरे शहर में इस बात की चर्चा तेज हो गई कि आखिर जलापूर्ति बहाल कराने का श्रेय किसे मिलेगा।
दो तस्वीरें,दो संदेश—
नगर परिषद अध्यक्ष शबरी पाल के नेतृत्व में एक समूह पंप हाउस पहुंचा, जबकि उपाध्यक्ष राणा ओझा के नेतृत्व में दूसरा समूह इंटेकवेल और पंप हाउस का निरीक्षण करने पहुंचा। दोनों पक्षों की तस्वीरें अलग-अलग व्हाट्सएप ग्रुप और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हुईं। इन तस्वीरों ने यह संदेश दिया कि नगर परिषद के जनप्रतिनिधि एकजुट होने के बजाय अलग-अलग खेमों में बंट चुके हैं।
जनता पानी के लिए परेशान, नेता श्रेय की दौड़ में—
करीब पंद्रह दिनों तक जलापूर्ति बाधित रहने से हजारों परिवारों को पेयजल संकट का सामना करना पड़ा। लोगों को निजी साधनों से पानी की व्यवस्था करनी पड़ी। जैसे ही योजना बहाल हुई, जनता को राहत तो मिली, लेकिन इसके साथ ही राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ भी शुरू हो गई। शहर में चर्चा है कि जनता की समस्या के समाधान से अधिक जोर इस बात पर रहा कि सफलता का श्रेय किसके खाते में जाए।
नगर परिषद में गुटबाजी खुलकर आई सामने—-
इस पूरे घटनाक्रम ने नगर परिषद के भीतर चल रही गुटबाजी को सार्वजनिक कर दिया है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के समर्थन में वार्ड पार्षद अलग-अलग खेमों में दिखाई दिए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह केवल जलापूर्ति का मामला नहीं, बल्कि आने वाले समय की नगर परिषद की आंतरिक राजनीति का भी संकेत है।
अध्यक्ष का पक्ष
नगर परिषद अध्यक्ष शबरी पाल ने कहा कि जलापूर्ति बाधित होने के बाद से वह लगातार अधिकारियों के संपर्क में थीं और शुक्रवार को स्वयं इंटेकवेल एवं पंप हाउस पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने कहा कि वह व्यक्तिगत श्रेय लेने में विश्वास नहीं रखतीं। उनके अनुसार जनता का विश्वास जीतना ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है और नियमित पेयजल आपूर्ति उनके प्रमुख वादों में शामिल है।

उपाध्यक्ष का पक्ष-—
नगर परिषद उपाध्यक्ष राणा ओझा ने कहा कि जल संकट को लेकर वह वार्ड पार्षदों के साथ उपायुक्त से मिले थे। उनके हस्तक्षेप के बाद संबंधित विभाग ने जलापूर्ति बहाल की। उन्होंने कहा कि जनता की परेशानी दूर करना उनकी जिम्मेदारी है और योजना को चालू कराने के लिए उन्होंने लगातार प्रयास किया।
सबसे बड़ा सवाल–
जलापूर्ति बहाल होना निश्चित रूप से जनता के लिए राहत की खबर है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है—क्या जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता जनता की समस्या का समाधान है या फिर समाधान का श्रेय हासिल करना?जब शहर पानी के संकट से जूझ रहा था, तब लोगों की अपेक्षा थी कि सभी जनप्रतिनिधि एक मंच पर आकर समाधान निकालेंगे। लेकिन जलापूर्ति शुरू होने के बाद सामने आई तस्वीरों ने नगर परिषद की आंतरिक खींचतान और गुटबाजी को उजागर कर दिया।बहरहाल जनता पेयजल शुरू होने से बड़ी राहत का सांस ले ली है.
