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Maqsood Alam
(News Head)

बंगाल की सीमा से झारखंड में घुसा खनन का दायरा, 9.71 एकड़ जमीन पर खुदाई का मामला एसीबी जांच तक पहुंचा

सामचार चक्र संवाददाता

पाकुड़।झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमा पर पत्थर खनन से जुड़ा एक मामला अब स्थानीय प्रशासनिक जांच से निकलकर एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी), दुमका की जांच के दायरे में पहुंच गया है। आरोप है कि पश्चिम बंगाल की ओर से खनन करते-करते झारखंड की सीमा में स्थित सरकारी और रैयती जमीन तक उत्खनन का दायरा पहुंच गया।पूर्व की प्रशासनिक जांच में करीब 9.71 एकड़ भूमि पर खनन गतिविधि से प्रभावित होने की बात सामने आई थी।बुधवार को एसीबी की टीम पाकुड़ पहुंची।डीएसपी स्तर के अधिकारी और पुलिस निरीक्षक के नेतृत्व में टीम ने मामले से जुड़े दस्तावेजों और स्थल की स्थिति की जानकारी जुटाई।एसआईआर-2026 से संबंधित कार्यों में व्यस्तता के कारण एसडीएम से टीम की मुलाकात नहीं हो सकी। इसके बाद एसीबी अधिकारियों ने खनन विभाग पहुंचकर संबंधित अभिलेखों की जांच की।दस्तावेजी पड़ताल के बाद टीम मालपहाड़ी थाना क्षेत्र के कान्हूपुर स्थित खदान क्षेत्र पहुंची।यहां अधिकारियों ने स्थल का निरीक्षण किया, मौके पर मौजूद ग्रामीणों और स्थानीय लोगों से जानकारी ली तथा खनन क्षेत्र की फोटोग्राफी कराई। हालांकि जांच के संबंध में एसीबी अधिकारियों ने फिलहाल कोई विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।

तीन मौजा में मिली थी 9.71 एकड़ भूमि प्रभावित होने की बात—

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मामले की पूर्व प्रशासनिक जांच में पाकुड़ अंचल के सिंगडडा,कसियाडांगा और कान्हूपुर मौजा में खनन गतिविधि से जमीन प्रभावित होने की बात सामने आई थी।जांच रिपोर्ट के अनुसार सिंगडडा में 6 बीघा 13 कट्ठा 5 धूर,कसियाडांगा 5 बीघा 17 कट्ठा 6 धूर,कान्हूपुर: 16 बीघा 17 कट्ठा 7 धूर
भूमि पर उत्खनन की स्थिति की जांच की गई थी।जांच में सरकारी के साथ-साथ रैयती भूमि भी प्रभावित होने की बात सामने आने से मामला और गंभीर हो गया।

सबसे बड़ा सवाल सीमा कहां खत्म हुई और खनन कहां तक पहुंचा?

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू झारखंड-बंगाल सीमा से जुड़ा है। शिकायत के मुताबिक पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के मुरारोई थाना क्षेत्र स्थित राजग्राम की दिशा से खनन का विस्तार झारखंड के सीमावर्ती हिस्से तक हुआ।

यही वह बिंदु है,जहां जांच कई अहम सवाल खड़े करती है—

क्या खनन की अनुमति पश्चिम बंगाल की सीमा तक ही थी?अगर थी,तो झारखंड की जमीन तक उत्खनन कैसे पहुंचा?रैयती जमीन पर खुदाई किसकी अनुमति से हुई?जमीन की वास्तविक सीमा का निर्धारण कब और किस स्तर पर हुआ?और पूर्व की प्रशासनिक जांच के बाद संबंधित कार्रवाई किस स्तर तक पहुंची?इन सवालों के जवाब अब एसीबी की जांच में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

पहले प्रशासन ने कराई थी मापी और तैयार हुआ था ट्रेस मैप—

शिकायत सामने आने के बाद प्रशासन की ओर से संयुक्त जांच टीम गठित कर क्षेत्र का निरीक्षण और जमीन की मापी कराई गई थी। जांच के दौरान जमीन की स्थिति का आकलन करते हुए पाकुड़ अंचल अधिकारी की ओर से ट्रेस मैप सहित जांच प्रतिवेदन तैयार किए जाने की बात सामने आई थी।इसके बाद संबंधित लोगों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए जिला खनन विभाग को पत्र भेजे जाने की जानकारी भी सामने आई थी। बावजूद इसके अब एसीबी टीम का खदान स्थल तक पहुंचना इस मामले की जांच को एक नए स्तर पर ले गया है।

अब एसीबी की नजर दस्तावेज से लेकर जमीन तक—

एसीबी की टीम ने जिस तरह पहले विभागीय दस्तावेजों की पड़ताल की और उसके बाद सीधे खदान स्थल पर पहुंचकर निरीक्षण किया, उससे स्पष्ट है कि मामले में कागजी रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति के बीच मिलान अहम हो सकता है।मौके पर ग्रामीणों से पूछताछ और फोटोग्राफी भी जांच का हिस्सा रही। हालांकि एसीबी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि जांच किस शिकायत या किस स्तर पर प्राप्त सूचना के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है और आगे किन लोगों से पूछताछ की जाएगी।

जांच के केंद्र में रहेंगे ये सवाल—

1- 9.71 एकड़ भूमि की वास्तविक स्थिति क्या है?

2- प्रभावित भूमि में कितनी सरकारी और कितनी रैयती जमीन है?

3- खनन की अनुमति किस क्षेत्र और किस भूमि के लिए थी?

4-पश्चिम बंगाल की ओर से उत्खनन झारखंड की सीमा में कैसे पहुंचा?

5- जमीन की मापी और सीमा निर्धारण से जुड़े रिकॉर्ड क्या कहते हैं?

6-पूर्व प्रशासनिक जांच में सामने आए तथ्यों पर क्या कार्रवाई हुई?

7-खनन से जुड़े विभागीय रिकॉर्ड और मौके की वास्तविक स्थिति में कोई अंतर है या नहीं?

अब रिपोर्ट का इंतजार–

करीब 9.71 एकड़ भूमि पर कथित अवैध उत्खनन से जुड़ा यह मामला अब केवल जमीन की खुदाई तक सीमित नहीं रह गया है। सीमा निर्धारण, रैयती अधिकार, खनन अनुमति, विभागीय रिकॉर्ड और पूर्व की जांच में हुई कार्रवाई-इन सभी पहलुओं पर सवाल खड़े हैं।एसीबी की टीम द्वारा दस्तावेजों की जांच के बाद खदान स्थल का निरीक्षण किए जाने से अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जमीनी साक्ष्य और सरकारी रिकॉर्ड के मिलान में क्या तथ्य सामने आते हैं और जांच आगे किस दिशा में बढ़ती है।

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