कृपा सिंधु बच्चन@समाचार चक्र
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पाकुड़-एक तो नया साल, और नया रिकॉर्ड न बने,तो रेकॉर्ड ही बन जाये ! है कि नहीं ? रेकॉर्ड के जो रूम,अर्थात कमरे होते हैं, वहाँ हर ओर से पुरानी फाइलों और वर्षों बासी पड़े काग़ज़ों से ऐसे सुगंध आते हैं,कि एक ख़ुमारी सी बनती है। वो ख़ुमारी जब नगर में वो भी नगर नरेश के साथ निकलती है,तो वो तो फिर पूछो मत भईया!इसके बाद शासन प्रशासन जैसे दमदार आँगन की छाँव में अकड़ की सुगंध लिए दीवारों के बीच अगर अंगूर की बेटी कैबरे करने लग जाय तो एक ग़ज़ब का माहौल बन जाता है। इसी बीच अगर कोई बात बिगड़ जाय तो सात टाँके न लगे,ये कैसे हो सकता है ? नगर तक कराह उठता है।ये बात और है कि बड़े लोगों की बड़ी बातों के बीच बड़े बड़े लोग आ जाते हैं,और फिर किसी प्रभावशाली के बड़े से आँगन में बड़ी बात को छोटी बनाकर छुपा दिया जाता है।लेकिन सवाल उठता है कि इन ख़ुमारियों में हुई ठुमरियों को छुपाये नहीं छुपता और रेकर्ड के गलियारों से निकली कोई भी बात जब नगर से जुड़ जाय तो फ़िर हम जैसे तीसरी नज़रों के जीते जी नगर में छुपती तो नहीं ।हालांकि सभी टोपियों ने अपनी एकजुटता से और अपनी गहराई में बात को छुपाने के सराहनीय प्रयास किये,पर अंगूर की बेटी के कैबरे से निकली घुंघरुओं की खनक से बनी शोर दूर तलक पहुँच ही जाती है।लेकिन हम तो कहेंगे जैसे “बुरा न मानो होली है” कह हम बहुत कुछ संभाल लेते हैं, ठीक वैसे ही आंग्ल नववर्ष पर भी अंगूरी भाभी के लालरंजित बातों को भी हम सात टांकों के अंदर ही दफ़न रहने दें तो अच्छा है।शब्दों को हमने बुन जरूर दिया,लेकिन रहेंगे तो चुप ही।
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