सामचार चक्र संवाददाता
पाकुड़-झारखंड का पाकुड़ रेलवे स्टेशन पूर्वी रेलवे के हावड़ा मंडल के उन प्रमुख स्टेशनों में शामिल है,जहां से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कोयला,ब्लैक स्टोन और स्टोन चिप्स देश के विभिन्न राज्यों में रेल मार्ग से भेजे जाते हैं। माल ढुलाई से रेलवे को हर वर्ष करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस स्टेशन की कमाई से रेलवे की तिजोरी भरती है,वहीं के यात्री आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।यह सवाल अब केवल सुविधा का नहीं, बल्कि न्याय और प्राथमिकता का बन गया है।आखिर जिस स्टेशन से रेलवे को इतना बड़ा राजस्व मिलता है,वह आज तक एक आदर्श रेलवे स्टेशन क्यों नहीं बन सका?
फर्स्ट क्लास का बोर्ड, लेकिन सुविधा कहीं नहीं—
स्टेशन पर प्रथम श्रेणी प्रतीक्षालय का बोर्ड तो लगा है,लेकिन अंदर न एयर कंडीशनर है,न आरामदायक बैठने की व्यवस्था और न ही वह सुविधाएं,जिनका अधिकार प्रथम श्रेणी टिकटधारक यात्रियों को होना चाहिए।हालत यह है कि वहां आम यात्री भी बैठते हैं,क्योंकि अलग से कोई समुचित व्यवस्था नहीं है।दूसरी ओर, स्टेशन पर बना वीवीआईपी कक्ष आम यात्रियों के लिए पूरी तरह बंद है।जब स्टेशन प्रबंधक से इस बारे में पूछा गया तो उनका स्पष्ट जवाब था कि “यह पब्लिक के लिए नहीं है।” ऐसे में सवाल उठता है कि जब प्रथम श्रेणी यात्रियों के लिए भी उचित प्रतीक्षालय उपलब्ध नहीं है,तब वीवीआईपी कक्ष का औचित्य क्या है?
एस्केलेटर और लिफ्ट भी बने शोपीस—
करोड़ों रुपये खर्च कर लगाए गए एस्केलेटर और लिफ्ट यात्रियों को राहत देने के बजाय परेशानी का कारण बन गए हैं। अक्सर इनके खराब रहने की शिकायतें मिलती हैं। सबसे अधिक दिक्कत बुजुर्गों, महिलाओं,दिव्यांगों और छोटे बच्चों के साथ यात्रा करने वाले परिवारों को होती है।जब स्टेशन प्रबंधक एल. आर. हेम्ब्रम से इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि लिफ्ट की मरम्मत का कार्य चल रहा है और जल्द ही ठीक हो जाएगी।वहीं एस्केलेटर फिलहाल खराब है,जिसे भी जल्द ठीक कराया जाएगा।
सुविधाओं की लंबी सूची, समाधान का इंतजार—
स्टेशन पर स्वच्छ पेयजल,आधुनिक शौचालय,पर्याप्त बैठने की व्यवस्था,पार्किंग, यातायात प्रबंधन और सौंदर्यीकरण जैसे मुद्दे वर्षों से उठते रहे हैं। लेकिन यात्रियों का कहना है कि समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।स्थानीय लोगों का आरोप है कि पाकुड़ हमेशा रेलवे की प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे रहा है, जबकि राजस्व के मामले में इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
क्या स्थानीय समस्याएं दबा दी जाती हैं—
शहर के कई लोगों का कहना है कि एक ही स्थान पर वर्षों से जमे कुछ रेल कर्मचारियों के कारण स्थानीय समस्याएं उच्च अधिकारियों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पातीं।हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।लोगों का मानना है कि समय-समय पर प्रशासनिक बदलाव और जवाबदेही तय होने से व्यवस्था में सुधार आ सकता है।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी सवाल—
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वर्षों से जनप्रतिनिधियों ने पाकुड़ रेलवे स्टेशन की समस्याओं को रेलवे बोर्ड और रेल मंत्रालय के समक्ष उतनी मजबूती से नहीं उठाया,जितनी जरूरत थी।उनका मानना है कि यदि लगातार और प्रभावी पैरवी होती, तो आज पाकुड़ स्टेशन की तस्वीर अलग होती।

रेलवे का नियम क्या कहता है?—
रेलवे के नियमों के अनुसार किसी स्टेशन से होने वाली आय सीधे उसी स्टेशन पर खर्च नहीं की जाती। बजट पूरे रेलवे नेटवर्क की प्राथमिकताओं और स्वीकृत परियोजनाओं के आधार पर आवंटित किया जाता है। इसके बावजूद स्थानीय लोगों का कहना है कि जो स्टेशन रेलवे को इतना बड़ा राजस्व देता है,उसे कम से कम यात्री सुविधाओं के मामले में मॉडल स्टेशन का दर्जा मिलना चाहिए।
पाकुड़ की जनता की प्रमुख मांगें—
:–पूर्ण सुविधाओं वाला वातानुकूलित प्रथम श्रेणी प्रतीक्षालय।
:–एस्केलेटर और लिफ्ट का नियमित संचालन एवं रखरखाव।
:–वीवीआईपी कक्ष के उपयोग की समीक्षा कर यात्री सुविधाओं का विस्तार।
:–स्वच्छ पेयजल, आधुनिक शौचालय और पर्याप्त बैठने की व्यवस्था।
:–स्टेशन परिसर का सौंदर्यीकरण एवं पार्किंग का विस्तार।
:–महत्वपूर्ण ट्रेनों का ठहराव बढ़ाया जाए।
:–पाकुड़ स्टेशन का समग्र आधुनिकीकरण कर मॉडल स्टेशन के रूप में विकसित किया जाए।
अब बड़ा सवाल…
पाकुड़ की धरती से निकलने वाला कोयला और ब्लैक स्टोन रेलवे की आय बढ़ा रहे हैं। मालगाड़ियां लगातार दौड़ रही हैं, राजस्व लगातार बढ़ रहा है। लेकिन जब बात यात्रियों की सुविधा की आती है, तो तस्वीर निराशाजनक दिखाई देती है।पाकुड़ की जनता पूछ रही है-क्या रेलवे के लिए पाकुड़ सिर्फ कमाई का जरिया है,या यहां रहने और यात्रा करने वाले लाखों लोगों का भी कोई अधिकार है?बहरहाल अब देखना होगा कि रेलवे आगे क्या कार्रवाई करती है.

