अबुल काशिम@समाचार चक्र
पाकुड़। परिंदों को मंजिल मिलेगी यकीनन, यह फैले हुए उनके पंख बोलते हैं… वो लोग रहते हैं खामोश अक्सर, जमाने में जिनके हुनर बोलते हैं। इस कहावत को पाकुड़ प्रखंड के सितेशनगर नया चांदपुर गांव के रहने वाले मो. कादिर अली ने पूरी तरह चरितार्थ कर दिखाया है। बचपन से ही दाएं हाथ से दिव्यांग कादिर ने कभी अपनी शारीरिक लाचारी और घर की कंगाली को अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया। दाएं हाथ के काम ना करने पर उन्होंने बचपन में ही बाएं हाथ से लिखना सीखा और अपनी किस्मत खुद लिखी। दृढ़ इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और निरंतर शिक्षा के प्रति समर्पण से कादिर डॉक्टर बनकर देश सेवा करने के सपने को साकार करने के बेहद करीब है। उन्हें उत्कृष्ट सफलता के आधार पर ऑल इंडिया कोटे के तहत प्रतिष्ठित सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट आवंटित हुई है। आज राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में ऑल इंडिया कैटेगरी (ईडब्लूएस पीडब्ल्यूडी) में 2240वीं रैंक हासिल कर उन्होंने ऑल इंडिया कोटे से सरकारी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर बनने का अपना सपना साकार कर लिया है।
गरीबी में ट्यूशन पढ़ाकर पूरी की पढ़ाई, पिता करते हैं खेती
कादिर का यह सफर बेहद कांटों भरा रहा है। उनके पिता अब्दुल सुभान एक साधारण किसान हैं, जिनके लिए पूरे परिवार का गुजर-बसर करना ही एक बड़ी चुनौती था। घर की आर्थिक तंगी ऐसी थी कि पढ़ाई का खर्च निकालना मुश्किल होता था, लेकिन कादिर ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाने के लिए छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। दिन में ट्यूशन पढ़ाना, खेतों में पिता का हाथ बंटाना और रात में दीये की रोशनी में पढ़ाई करना उनकी दिनचर्या बन गई थी।
स्कूली शिक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक का अटूट शैक्षणिक सफर
कादिर अली का मानना है कि शिक्षा ही गरीबी और लाचारी का एकमात्र इलाज है। इसी सोच के साथ उन्होंने लगातार उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने 10वीं की पढ़ाई हरिणडांगा हाई स्कूल, पाकुड़ से पुरी की। वहीं 12वीं बीएम. कॉलेज, हवेली खड़कपुर (मुंगेर), बीएससी टीएनबी. कॉलेज, भागलपुर, एमएससी रांची विश्वविद्यालय, एमए (एमए- मनोविज्ञान), स्नातकोत्तर डिग्री, बीएड बाबा साहेब अंबेडकर विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल से प्राप्त किया। एमएससी, एमए और बीएड जैसी बड़ी डिग्रियां हासिल करने के बाद भी उनका सपना देश की सेवा बतौर डॉक्टर करने का था, जिसे उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत के बल पर आखिरकार सच कर दिखाया।
पूरे इलाके के लिए बने प्रेरणा का स्रोत
बाएं हाथ से लिखने वाले एक किसान के बेटे की इस ऐतिहासिक सफलता ने पूरे पाकुड़ जिले और ग्रामीण क्षेत्र को गौरवान्वित कर दिया है। गांव में जैसे ही यह खबर पहुंची, खुशी की लहर दौड़ गई और कादिर के घर बधाई देने वालों का तांता लग गया। कादिर अली की यह कहानी साबित करती है कि अगर इंसान के हौंसले बुलंद हों, तो शरीर की कोई भी दिव्यांगता या कंगाली की जंजीरें उसे उसकी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकतीं।

