Homeपाकुड़अनाथालय में गुजरा बचपन,अब अनाथ बच्चों के लिए बने सहारा-अलेक्स सैम
Maqsood Alam
(News Head)

अनाथालय में गुजरा बचपन,अब अनाथ बच्चों के लिए बने सहारा-अलेक्स सैम

:--ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सातवें वैश्विक बाल एवं युवा सम्मेलन में शोध के जरिए बच्चों की देखभाल और भावनात्मक सुरक्षा पर रखी अपनी बात

मकसूद आलम की ग्राउंड रिपोर्ट

पाकुड़।कभी खुद अनाथालय में रहकर बचपन गुजारा,फिर मुंबई की सड़कों पर जिंदगी के कठिन दौर का सामना किया।आज वही एलेक्स सैम उन बच्चों के लिए आवाज बन चुके हैं, जिनके सिर से परिवार का साया छिन गया है। उनका संघर्ष अब केवल उनकी निजी कहानी नहीं, बल्कि जरूरतमंद और अनाथ बच्चों के लिए परिवार जैसा सुरक्षित और अपनापन भरा माहौल उपलब्ध कराने की मुहिम बन चुका है।झारखंड के पाकुड़ शहर के सामाजिक कार्यकर्ता और शोधकर्ता एलेक्स सैम ने यूनाइटेड किंगडम के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में आयोजित सातवें वैश्विक बाल एवं युवा सम्मेलन में बच्चों की देखभाल से जुड़े अपने शोध के माध्यम से परिवार आधारित देखभाल की आवश्यकता को प्रमुखता से सामने रखा।उनके शोध का केंद्र अनाथालय और परिवार में बच्चों की देखभाल के बीच का अंतर है। साहित्य और सामाजिक दृष्टिकोण के आधार पर उन्होंने यह समझाने का प्रयास किया कि परिवार से दूर रहने वाले बच्चों के भावनात्मक और व्यक्तित्व विकास पर किस तरह का प्रभाव पड़ सकता है।

बच्चे को सिर्फ छत नहीं, अपनेपन की जरूरत——

एलेक्स सैम का कहना है कि बच्चे के विकास के लिए भोजन,कपड़े,शिक्षा और रहने की जगह जरूरी है, लेकिन केवल इन जरूरतों को पूरा कर देना पर्याप्त नहीं है। बच्चे को अपने मन की बात कहने के लिए किसी अपने की जरूरत होती है।डर लगने पर सहारा देने वाला,गलती पर समझाने वाला और छोटी-सी सफलता पर खुशी मनाने वाला कोई अपना हो, तो बच्चे के भीतर आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना मजबूत होती है।उनके अनुसार,संस्थागत देखभाल बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकती है, लेकिन परिवार जैसा व्यक्तिगत लगाव, भावनात्मक सुरक्षा और निरंतर अपनापन हर बच्चे को मिल पाना चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए बाल देखभाल की व्यवस्था में बच्चों की भावनात्मक जरूरतों को भी उतनी ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए जितनी उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य को।

साहित्य के पात्रों के जरिए सामने रखा बचपन का दर्द——

अपने शोध में एलेक्स सैम ने ‘ओलिवर ट्विस्ट’, ‘जेन आयर’, ‘द एडवेंचर्स ऑफ हकलबेरी फिन’ और ‘हैरी पॉटर’ जैसे चर्चित साहित्यिक पात्रों के उदाहरणों का भी उल्लेख किया है।इन पात्रों के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया कि परिवार से दूर या असुरक्षित परिस्थितियों में पलने वाले बच्चों को किस तरह के भावनात्मक संघर्षों का सामना करना पड़ता है।शोध में साहित्य की सामाजिक भूमिका पर भी जोर दिया गया है। कहानियों के माध्यम से बच्चों के संघर्ष, अकेलेपन और भावनाओं को समाज के सामने लाने से उनके प्रति संवेदना और समझ विकसित की जा सकती है।

खुद झेला अनाथालय का दर्द, इसलिए बदली सोच——

एलेक्स सैम का जीवन उनके शोध की सबसे बड़ी पृष्ठभूमि है। राजस्थान के कोटा स्थित इमैनुएल अनाथालय में उनका बचपन बीता। इसके बाद उन्होंने मुंबई की सड़कों पर भी जीवन के कठिन दौर का सामना किया।इन अनुभवों ने उन्हें उन बच्चों का दर्द करीब से समझने का अवसर दिया, जो परिवार और सुरक्षित घर से दूर जीवन बिताने को मजबूर हैं।आज पाकुड़ में एवरेट मिशन चैरिटेबल ट्रस्ट और एलेक्स फाउंडेशन के माध्यम से वह जरूरतमंद और अनाथ बच्चों के लिए काम कर रहे हैं। उनका प्रयास बच्चों को केवल आश्रय देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें परिवार जैसा सुरक्षित, सम्मानजनक और अपनापन भरा वातावरण उपलब्ध कराने पर केंद्रित है।

शिक्षा से सामाजिक सेवा और शोध तक का सफर—

एलेक्स सैम ने व्यवसाय प्रशासन में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। वर्तमान में वह झारखंड के देवघर स्थित दुर्गा सोरेन विश्वविद्यालय से सामाजिक कार्य में पीएचडी कर रहे हैं।सामाजिक क्षेत्र में उनके कार्यों को कई स्तरों पर सम्मान भी मिला है। वर्ष 2025 में उन्हें नई दिल्ली में राष्ट्रीय युवा प्रेरणा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें इंडिया लिटरेसी अवॉर्ड 2026 से भी सम्मानित किया गया है।

बचपन को सिर्फ छत नहीं,एक अपना चाहिए——-

एलेक्स सैम की सोच का सार यही है कि हर बच्चे को ऐसा माहौल मिलना चाहिए, जहां वह खुद को सुरक्षित महसूस करे। उसकी बात सुनी जाए, उसकी भावनाओं को समझा जाए और उसे यह भरोसा हो कि मुश्किल समय में कोई उसके साथ खड़ा है।जिन बच्चों के माता-पिता या परिवार उनके साथ नहीं हैं, उनके लिए भी ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जहां उन्हें केवल रहने की जगह नहीं बल्कि प्यार, सुरक्षा, सम्मान और अपनापन मिल सके।जिस बचपन ने कभी अपनापन तलाशा था, आज वही बचपन दूसरों के लिए अपनापन बांटने की मुहिम बन गया है।एलेक्स सैम का ऑक्सफोर्ड में प्रस्तुत शोध इसी मानवीय सोच को वैश्विक मंच पर सामने रखता है कि बच्चे को सिर्फ एक छत नहीं चाहिए, उसे एक ऐसा घर चाहिए जहां कोई कहे ‘तुम हमारे अपने हो।’ यही एहसास उसके भविष्य की सबसे मजबूत नींव बन सकता है।

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