मकसूद आलम
पाकुड़।जिस उम्र में हाथों में किताबें और आंखों में भविष्य के सपने होने चाहिए,उस उम्र में अगर किसी किशोरी के कंधों पर शादी और मातृत्व की जिम्मेदारी आ जाए तो यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं रहती।यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बन जाती है।पाकुड़ जिले में 15 से 19 वर्ष की 22.8 प्रतिशत किशोरियां मां बन चुकी हैं या गर्भवती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 से जुड़े इस आंकड़े ने कम उम्र में विवाह और मातृत्व की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
आंकड़ा बता रहा,समस्या अभी खत्म नहीं हुई—
विज्ञापन
बाल विवाह को रोकने के लिए कानून मौजूद है,जागरूकता अभियान भी चलते हैं,लेकिन ग्रामीण और सामाजिक स्तर पर अब भी कम उम्र में बेटियों की शादी की मानसिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।आर्थिक परेशानी,सामाजिक दबाव,अशिक्षा और पुरानी सोच कई बार परिवारों को जल्द शादी के फैसले तक ले जाती है।इसका सबसे बड़ा असर किशोरियों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ता है।शादी के बाद पढ़ाई छूटने की संभावना बढ़ जाती है।कम उम्र में गर्भधारण से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है। इसके साथ ही किशोरियों की निर्णय लेने की क्षमता, आत्मनिर्भरता और अपने भविष्य को लेकर विकल्प सीमित होते जाते हैं।
18 की उम्र से पहले शादी…कानून की नजर में अपराध—-
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष निर्धारित है। इससे कम उम्र में शादी कराना कानूनन अपराध है।सिर्फ शादी करने वाला ही नहीं,बल्कि बाल विवाह कराने, करवाने,आयोजित करने या उसमें सहयोग करने वाले लोगों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। माता-पिता या अभिभावक भी बाल विवाह को रोकने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हैं।
कानून की जानकारी जरूरी, लेकिन सामाजिक सोच बदलना उससे भी जरूरी—-
बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई सिर्फ पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं हो सकती।परिवार, शिक्षक, पंचायत प्रतिनिधि, सामाजिक संगठन, धार्मिक गुरु और आम नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।गांव-मोहल्लों में यदि किसी नाबालिग की शादी की तैयारी की जानकारी मिलती है तो उसे ‘परिवार का मामला’ समझकर चुप रहने के बजाय समय रहते सूचना देना जरूरी है। एक समय पर दी गई सूचना किसी बच्ची की पूरी जिंदगी बदल सकती है।
बेटी की शादी जल्दी नहीं, पढ़ाई जरूरी—
आज जरूरत इस सोच को बदलने की है कि बेटी की शादी जितनी जल्दी हो जाए,उतना अच्छा। इसके बजाय परिवारों को यह समझना होगा कि बेटी को पढ़ाना,उसे सक्षम बनाना और अपने पैरों पर खड़ा करना ही उसके सुरक्षित भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।विद्यालय और पंचायत स्तर पर किशोर-किशोरियों को उनके अधिकारों की जानकारी देने के साथ अभिभावकों को भी बाल विवाह के कानूनी और सामाजिक दुष्परिणामों से अवगत कराना होगा।
एक सूचना बचा सकती है किसी का बचपन—
यदि आपके आसपास बाल विवाह की तैयारी हो रही है, तो चुप न रहें। मामले की सूचना चाइल्डलाइन 1098, पुलिस हेल्पलाइन 112 या नजदीकी थाना को दी जा सकती है।
सबसे बड़ा सवाल… बेटी का बचपन या समाज की पुरानी सोच—-
बाल विवाह की समस्या केवल एक शादी नहीं है। इसके पीछे एक बच्ची की पढ़ाई, स्वास्थ्य, सपने और पूरी जिंदगी जुड़ी होती है। जिस उम्र में उसे अपने भविष्य का रास्ता चुनना चाहिए, उस उम्र में शादी की जिम्मेदारी थोप देना उसके अधिकारों के साथ अन्याय है।
बाल विवाह रोकना सिर्फ कानून का पालन करना नहीं है। यह एक बेटी का बचपन बचाने, उसके सपनों को जिंदा रखने और उसे अपने पैरों पर खड़ा होने का मौका देने की जिम्मेदारी है।
पाकुड़ के लिए सवाल—
22.8% का आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं… यह संकेत है कि बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई अभी बाकी है।
उप विकास आयुक्त अरविंद लाल ने कहा-बाल विवाह रोकने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
उप विकास आयुक्त अरविंद लाल ने कहा कि बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति को जड़ से खत्म करने के लिए प्रशासन के साथ-साथ समाज के हर वर्ग को एकजुट होकर आगे आना होगा। परिवार, पंचायत प्रतिनिधि, शिक्षक, सामाजिक संगठन और आम नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझें तथा बाल विवाह की किसी भी सूचना को नजरअंदाज न करें। उन्होंने कहा कि बेटियों को कम उम्र में विवाह के बंधन में बांधने के बजाय उन्हें शिक्षा और अपने भविष्य को संवारने का अवसर दिया जाना चाहिए। जागरूकता और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही बाल विवाह पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है।

