अबुल काशिम@समाचार चक्र
पाकुड़। फर्क नहीं पड़ता उन्हें अपनी शोहरत और नाम से, सच्ची खुशी मिलती है उन्हें तो बस दूसरों के मुकाम से। थाम लेते हैं जो हाथ गांव की छुपी हुई प्रतिभाओं का, वे फरिश्ते ही तो देश का भविष्य रोशन कर जाते हैं। यह वाक्य शहर के एक ऐसे युवा खेलप्रेमी के लिए है, जिन्होंने अपने जीवन का तकरीबन एक दशक का बेशकीमती समय निःस्वार्थ भाव से खेल प्रतिभाओं को निखारने में दे दिए। जिन्हें लोग अम्लान कुसुम सिन्हा उर्फ बुल्टी दा के नाम से भी जानते है। उन्होंने जिला मुख्यालय और आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों से उभरते खिलाड़ियों को खोज निकाला और मुफ्त प्रशिक्षण दिलाकर निखारने का काम किया हैं। निःस्वार्थ भाव से ना केवल खिलाड़ियों के खेल कौशल को निखार रहे हैं, बल्कि उन्हें राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान भी दिला रहे हैं। उन्हें प्रशिक्षण के साथ-साथ आगे बढ़ने के लिए आर्थिक रूप से भी मदद करते आ रहे हैं।
खेल के मैदान से बदल रही युवाओं की तकदीर
इस युवा खेलप्रेमी ने गांव के धूल-धूसरित मैदानों से छुपी हुई दर्जनों प्रतिभावान खिलाड़ियों को खोज निकाला है। यूं कहे कि आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले बच्चों के लिए वे किसी मसीहा से कम नहीं हैं। बिना किसी सरकारी मदद या भारी फीस के खुद से खिलाड़ियों को किट, जूते और संतुलित आहार जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया कराते हैं। आज इन्हीं के अथक प्रयासों का परिणाम है कि कई युवा राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपना लोहा मनवा रहे हैं।
पहचान का सफर
गुमनामी से मंच तक गांव के इन प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के पास पहले अपनी प्रतिभा दिखाने का कोई मंच नहीं था। यह युवा खेलप्रेमी ना केवल उनकी तकनीक पर काम कर रहे हैं, बल्कि उन्हें विभिन्न टूर्नामेंट्स और कैंप्स तक ले जाकर उनकी पहुंच मजबूत कर रहे हैं। इस मार्गदर्शन का असर यह है कि कई खिलाड़ी अब स्कॉलरशिप और सरकारी लाभ उठाने के योग्य हो गए हैं।
एक नई उम्मीद और जज्बा
इस निःस्वार्थ पहल से युवाओं में ना सिर्फ खेलों के प्रति रुचि बढ़ी है, बल्कि वे गलत आदतों से दूर होकर अनुशासित भी हो रहे हैं। अम्लान कुसुम सिन्हा का मानना है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर यहां के युवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी देश का नाम रोशन कर सकते हैं। उनका यह प्रयास ग्रामीण भारत में खेलों के विकास और युवाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
ओलंपिक से शुरू हुआ मदद का सफर
अम्लान कुसुम सिन्हा का खेलप्रेमी के रूप में खिलाड़ियों को मदद का सफर साल 2014 से ओलंपिक से शुरू हुआ। आज वे पाकुड़ जिला ओलंपिक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में सेवा दे रहे हैं। तकरीबन एक दशक के खेल सेवा में आर्थिक रूप से कमजोर और सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में छिपी कई प्रतिभाओं को राज्य और राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने में सराहनीय भूमिका निभाई है। एथलेटिक्स, कुस्ती, कबड्डी, साइकिलिंग, वूशु और फुटबॉल जैसे खेलों में अवसर देकर खिलाड़ियों को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। ओलंपिक संघ से जुड़े रणवीर सिंह ने बताया कि कबड्डी में राज्य स्तर पर साल 2019 में, साइकिलिंग में राज्य स्तर पर साल 2020 में और एथलेटिक्स में राज्य स्तर पर साल 2023 में कई खिलाड़ियों को पहचान दिलाने में अम्लान कुसुम सिन्हा की बड़ी भूमिका रही है। वहीं एथलेटिक्स में फूल कुमारी मड़ैया, चांदमुनी चौड़े तथा साइकिलिंग में मिनी हेंब्रम और समीर अंसारी जैसे खिलाड़ियों को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई है। इतना ही नहीं, इनमें से कई ऐसे खिलाड़ी भी है, जिन्होंने खेल के क्षेत्र में पहचान बनाने के बाद अब सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में नौकरी भी कर रहे हैं। इनमें एथलेटिक्स की प्रतिभावान खिलाड़ी और हिरानंदनपुर गांव की रहने वाली फूल कुमारी मड़ैया चौकीदार के पद पर कार्यरत हैं। वहीं एथलेटिक्स के ही चकबलरामपुर की रहने वाली चांदमुनी चौड़े बतौर एकेडमी कोच काम कर रही है।
प्रशिक्षण केंद्र खुलवाने में रही बड़ी भूमिका
अम्लान कुसुम सिन्हा का प्रशिक्षण केंद्र खुलवाने में भी अहम भूमिका रही है। जिसमें खिलाड़ी एथलेटिक्स, वॉलीबॉल, कबड्डी और फुटबॉल जैसे खेलों का प्रशिक्षण ले रहे हैं। इनके अलावा स्टेडियम में रखरखाव में भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। अपने स्तर से स्टेडियम के देखरेख और रखरखाव में आर्थिक मदद तक दे रहे हैं।
खेल के साथ समाजसेवा भी
अम्लान कुसुम सिन्हा की एक और खासियत यह है कि खेल के क्षेत्र में सहयोग के साथ-साथ समाजसेवा में भी काफी रुचि रखते हैं। उन्होंने कई टीबी मरीजों को गोद लिया था। उनके बीच पोषण किट्स भी बांटी गई थी। कोरोना काल में भी जरूरतमंदों को काफी मदद पहुंचाई थी। इसके अलावा रक्तदान के क्षेत्र में भी उनकी बड़ी भूमिका रही है। उन्होंने स्वयं जरूरतमंद मरीजों के लिए रक्तदान किया है।

