समाचार चक्र संवाददाता
कोटालपोखर-यह केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं,बल्कि 43 वर्षों से अधूरी उम्मीदों,टूटे भरोसे और विकास की प्रतीक्षा की कहानी है।पश्चिम बंगाल की सीमा से सटा कोटालपोखर आज भी उस दिन का इंतजार कर रहा है,जब उसे अपना प्रखंड और अंचल मिलेगा।वर्ष 1983 में शुरू हुई यह मांग आज भी सरकारी फाइलों में घूम रही है।इस दौरान बिहार से झारखंड बना, कई मुख्यमंत्री आए और गए,कई विधायक और सांसद बदले,कई सरकारें बनीं और गिरीं,लेकिन कोटालपोखर की किस्मत नहीं बदली।
चार दशक का संघर्ष, फिर भी अधूरी मंजिल—
जब 6 अक्टूबर 1994 को तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने कोटालपोखर, मंडरो और उधवा को प्रखंड बनाने की घोषणा की थी,तब लोगों में नई उम्मीद जगी थी।लेकिन बाद में मंडरो और उधवा को प्रखंड का दर्जा मिल गया,जबकि कोटालपोखर पीछे छूट गया।1996 में फिर प्रस्ताव गया,2000 में झारखंड बनने के बाद उम्मीद जगी,2009 में फाइल कैबिनेट तक पहुंची,2013-14 में रिपोर्ट मांगी गई,2025 में जिला परिषद ने फिर प्रस्ताव पारित किया।हर बार आश्वासन मिला, लेकिन निर्णय नहीं।
जनता पूछ रही है-हमसे आखिर क्या गलती हुई?
कोटालपोखर के लोगों का सवाल है कि जब समान परिस्थितियों वाले अन्य क्षेत्रों को प्रखंड का दर्जा मिल सकता है,तो कोटालपोखर को क्यों नहीं?आज भी यहां के लोगों को जन्म प्रमाण पत्र,जाति,आय, आवासीय प्रमाण पत्र, पेंशन,राशन कार्ड,जमीन से जुड़े मामलों और अन्य सरकारी कार्यों के लिए बरहरवा प्रखंड कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं।बरसात के दिनों में यह दूरी और कठिन हो जाती है।गरीब,बुजुर्ग,महिलाएं और दिव्यांगों को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती है।
सीमा का महत्वपूर्ण क्षेत्र, फिर भी उपेक्षित—
कोटालपोखर केवल एक गांव नहीं,बल्कि व्यापार, रेलवे और सीमा क्षेत्र के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यहां बड़ी आबादी निवास करती है और आसपास की लगभग 10 पंचायतें सीधे इससे जुड़ी हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक सुविधाओं का अभाव क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।
जनप्रतिनिधियों से बड़ा सवाल–
हर चुनाव में विकास के वादे किए जाते हैं। चुनावी सभाओं में कोटालपोखर को प्रखंड बनाने की बात भी उठती है, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला जाता है।
अब सवाल केवल सरकार से नहीं,बल्कि स्थानीय विधायक, सांसद,जिला परिषद सदस्य और अन्य जनप्रतिनिधियों से भी है.
क्या 43 वर्षों का संघर्ष अभी और लंबा होगा?
क्या कोटालपोखर को सिर्फ आश्वासन ही मिलता रहेगा?
क्या जनप्रतिनिधि इस मुद्दे को विधानसभा और संसद में मजबूती से उठाएंगे?
हेमंत सरकार के सामने सुनहरा अवसर—
झारखंड सरकार यदि कोटालपोखर को प्रखंड एवं अंचल का दर्जा देती है, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं होगा,बल्कि चार दशक से अधिक समय से संघर्ष कर रहे हजारों लोगों की उम्मीदों का सम्मान होगा।मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अक्सर गांव और अंतिम व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने की बात करते हैं। ऐसे में कोटालपोखर को प्रखंड का दर्जा देना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
अब इंतजार नहीं,निर्णय चाहिए–
43 वर्षों का संघर्ष यह बताने के लिए काफी है कि यह मांग किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि जनता की सामूहिक आवाज है।
अब कोटालपोखर के लोग केवल घोषणा नहीं, बल्कि सरकारी अधिसूचना देखना चाहते हैं।वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी यह न कहे कि “हमारे बुजुर्ग प्रखंड की मांग करते-करते चले गए,लेकिन कोटालपोखर आज भी प्रखंड नहीं बन सका।”अब समय है कि सरकार और जनप्रतिनिधि इस ऐतिहासिक मांग पर ठोस निर्णय लें,ताकि 43 वर्षों का इंतजार आखिरकार खत्म हो सके।

