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ललन झा@समाचार चक्र
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अमड़ापाड़ा। जन्म और मृत्यू प्रारब्ध होता है।यह पूर्व से ही निर्धारित व निश्चित होता है।जन्म का आधार हमारा कर्म होता है। पूर्व जन्म के कर्म के अनुरूप ही हमारा जन्म होता है।अगर आपने किसी धनाढ्य परिवार में जन्म लिया तो यह भी आपका कर्म है।किसी का जन्म यदि दीन-हीन परिवार में होता है तो यह भी पूर्व जन्म का कर्म फल ही है। विडंबना यह है कि जब मेरे साथ कोई कुछ गलत करता है तो हमको भगवान दिखता है। हम कहते हैं अच्छा परमात्मा विचार करेगा या गलत करने वालों को दंडित करेगा। यही मेरे साथ भी लागू होता है। जब हम स्वयं गलत करते हैं तो परमात्मा की नजर वहां भी होती है। ईश्वर का न्याय सम होता है। मानवीय मूल्यों से जुड़ा यह संदेश बासमती के राधा-गोविंद मंदिर परिसर में सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दौरान दक्ष कथा वाचक श्री शिवम जी महाराज ने कथा वाचन के छठे दिन श्रोताओं को दिया। कहा: मृत्यू निश्चित है किंतु अंत नहीं है। फिर अगला जन्म लेकर कर्म फल भोगते हैं।जन्म-जन्मांतर के भंवर में फंसे रहते हैं। इस भंवर से निकलने के लिए कर्म करें। निष्काम कर्म करें और फल की चिंता कृष्ण पर छोड़ दें। हम मानवों को बुरा न करने और लिप्सा, हिंसा की भावना का त्याग करना चाहिए।वक्ता श्री महाराज ने कहा कि “कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहिं तस फल चाखा।”वैष्णव जन तो तेने कहिए,पीर पराई जानि रे : कथा वक्ता ने कहा कि जो चंदन लगा ले, भक्ति कर ले, मदिरा-मांस से परहेज कर ले, गले में माला और कंठी लगा ले, किन्तु सेवा भाव से वंचित हो, वह वैष्णव नहीं हो सकता। वैष्णव वही हो सकता है जो दूसरों की पीड़ा या दर्द को समझे। समभाव रखे। स्त्रियों का सम्मान करे। प्राणि मात्र पर दया करे। त्याग करे। धर्मानुचरण करे, वहीं सच्चा वैष्णव हो सकता है।
भक्त और भक्ति में भी अभिमान का कोई स्थान नहीं…
वृंदावन धाम से पधारे कथावाचक शिवम कृष्ण जी ने कहा की कृष्ण अहं और दर्प का नाश करते हैं। अगर भक्त को भक्ति का अभिमान हो जाए तो गलत है। अभिमान का त्याग कर ही हम गंगा स्नान, पूजन -भजन और भक्ति का फल प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर की भक्ति में अहंकार की कोई जगह नहीं। आप सहज और शुलभ बनें तभी कृष्ण कृपा को प्राप्त कर सकते हैं।
भगवान का रूप नहीं बदलता—
विद्वान कथा वाचक ने कहा कि ईश्वर सच्चिदानंद हैं। शास्वत हैं। सनातन हैं। अमर हैं। वो कमल नयन हैं। उनका रूप कभी बदलता ही नहीं। वो मेरे जैसा नहीं हैं। वो बूढ़े नहीं होते। चूंकि ईश्वर का देह भौतिक नहीं। भगवान के चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़तीं। उनके केष सफेद नहीं होते। उन्होंने बताया कि उनके रूप, नाम, स्थान और लीला का नाश नहीं होता।
आठ स्थानों पर एक दफा झूठ बोलना पाप नहीं—
भागवत में कहा गया है कि माताओं या महिलाओं से संवेदनशील बातों को छुपाना चाहिए। अगर हालात को संभालने के लिए उनसे एक दफा झूठ बोला जाय तो पाप नहीं।चूंकि वो शापित हैं। किसी गरीब कन्या की विवाह के लिए झूठ बोलना पाप नहीं। व्यापार में जीविकोपार्जन के लिए एक वार झूठ बोलना पाप नहीं। एक झूठ से यदि किसी की प्राण रक्षा हो जाय तो वह झूठ पाप नहीं। यदि एक झूठ से ब्राह्मणों के सम्मान या आजीविका की रक्षा हो जाय तो वह झूठ पाप नहीं ।चूंकि ब्राह्मण पूजनीय हैं। गौ रक्षा के लिए झूठ बोलना पाप नहीं। एक झूठ से यदि किसी बहन-बेटी की ईज्जत बच जाय तो वह भी पाप नहीं। अगर आपके एक झूठ बोलने से लड़ाई या विवाद रुक जाय तो वह झूठ पाप नहीं।


