Homeपाकुड़श्रीमदभागवत गीता कथा वाचन "जब नाश मनुज पर छाता है,पहले विवेक मर...
Maqsood Alam
(News Head)

श्रीमदभागवत गीता कथा वाचन “जब नाश मनुज पर छाता है,पहले विवेक मर जाता है “: कथावाचक शिवम कृष्ण जी महाराज

Gunjan Saha
(Desk Head)
  • ललन झा @समाचार चक्र
  • अमड़ापाड़ा जब द्वारिकाधीष श्री कृष्ण ने अपने विराट रूप का दर्शन कराया तो दुर्योधण सन्न रह गया। वह हतप्रभ हो भागने लगा। वह डोल गया। प्रभू के चेहरे के आभा मंडल से छटकती देदीप्यमान प्रकाश से स्वयं को छुपाने लगा। महायोद्धा कर्ण भी अपने आसन पर हिलने लगे। सभा में बैठे दिग्गज भी इस रूप को देख विस्मित थे। सिर्फ महारथी भीष्म, कृष्ण भक्ति में लीन विदुर, कुलगुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य ही उनके दर्शन का सुख पा रहे थे। अवसर था बासमती स्थित राधा-गोविंद मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा वाचन के तीसरे दिवस का। श्रद्धालू महिला-पुरुष भक्त कथा श्रोताओं से खचाखच भरा पंडाल। वृंदावन के विद्वद भागवत कथावाचक शिवम कृष्ण जी महाराज ने तथ्य को रोचक तरीके से परोसा। बताया कि कृष्ण दुर्योधण के पास शांति दूत बन कर पहुंचे। कहा : दो न्याय अगर तो आधा दो। पांडवों के लिए न्यायानुसार आधे राज्य की मांग किया । अंततः सिर्फ पांच गांव ही देने का अनुरोध किया। दुर्योधण दुराचारी और मद में अंधा था। उसने कहा सुई की नोंक भर जमीन भी नहीं दूंगा। अगर लेना हो तो युद्ध करके लो। भगवान ने समझाया युद्ध का परिणाम भयावह और भीषण होता है। तू स्वयं मृत्यू को ललकार रहा है। ” जब नाश मनुज पर छाता है ,पहले विवेक मर जाता है। “ फिर महाभारत युद्ध का प्रतिफल जो हुआ उसने समूचे कुरुवंश का नाश कर दिया। जवानी अंधी और बुढापा लंगड़ी है : कथावाचक ने कहा कि जवानी अंधी होती है। बुढ़ापा लंगड़ी। दुर्योधन के नाश का कारण उसका मदांध होना है। धृतराष्ट्र का पुत्रमोह संपूर्ण हस्तिनापुर को महा विनाश की ओर धकेल देता है। आर्यावर्त को रक्त रंजित कर देता है। पुत्रमोह में पुत्र दुर्योधण के गलत निर्णय पर भी चुप रहना प्रलय को आमंत्रित करना है। ऐसे में शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचे कृष्ण की सलाह को अंगीकार करना चाहिए था। भगवान वस्तुओं के नहीं भाव और श्रद्धा के भूखे होते हैं : कथावाचक शिवम कृष्ण जी महाराज ने कहा कि कृष्ण ने दुर्योधन के छप्पन भोगों का त्याग किया। विदुर की पत्नी अति दीन शुलभा के हाथों से केले का छिलका पाकर संतुष्ट हुए। इसलिए भगवान न आभाव में न प्रभाव में सिर्फ भाव में भोजन पान करते हैं। त्रेता में राम ने शबरी के जूठे बेर खाकर परमानंद का अनुभव किया था। द्वापर में कृष्ण ने शुलभा के हाथों से केले के छिलके पाकर आनंद की अनुभूति की थी। कृष्ण मायापति-योगेश्वर हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

RELATED ARTICLES

Recent Comments