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Maqsood Alam
(News Head)

जिनका कोई नहीं,उनका लोकतंत्र भी साथ दे” अनाथ बच्चों के अधिकारों के लिए अलेक्स सैम की मार्मिक अपील

एवरेट मिशन चेरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष ने झारखंड सरकार,भारत सरकार और निर्वाचन आयोग से एसआईआर प्रक्रिया को मानवीय बनाने की मांग उठाई

Gunjan Saha
(Desk Head)

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समाचार चक्र संवाददाता

पाकुड़।हर नागरिक को मतदान का अधिकार है, लेकिन जिन बच्चों का कोई परिवार ही नहीं, उनसे पारिवारिक दस्तावेज़ मांगना कितना न्यायसंगत है?इसी संवेदनशील सवाल के साथ एवरेट मिशन चेरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष अलेक्स सैम ने अनाथ एवं बेसहारा बच्चों की ओर से झारखंड सरकार,भारत सरकार और भारत निर्वाचन आयोग से एक मार्मिक अपील की है।
अलेक्स सैम ने कहा कि उनका और उनके परिवार का एसआईआर की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हो चुकी है,लेकिन समाज का एक ऐसा वर्ग है जिसकी पीड़ा अब भी अनसुनी है।उन्होंने बताया कि वे स्वयं एक अनाथ आश्रम में पले-बढ़े हैं, इसलिए वे उन हजारों अनाथ बच्चों का दर्द भली-भांति समझते हैं, जिनके माता-पिता, दादा-दादी,नाना-नानी या अन्य पारिवारिक सदस्यों का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चों के पास परिवार से जुड़े दस्तावेज़ नहीं होते, लेकिन वे भारत के नागरिक हैं और वर्षों से मतदाता सूची में उनका नाम दर्ज है.यदि एसआईआर या अन्य निर्वाचन प्रक्रियाओं में पारिवारिक दस्तावेज़ों की अनिवार्यता सामने आती है,तो इन नागरिकों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।अलेक्स सैम ने भारत निर्वाचन आयोग, भारत सरकार और झारखंड सरकार से आग्रह किया कि अनाथ आश्रमों में पले-बढ़े तथा पारिवारिक पहचान से वंचित नागरिकों के लिए अलग,सरल और मानवीय प्रक्रिया लागू की जाए।अलेक्स ने सुझाव दिया कि अनाथालय का प्रमाणपत्र, पहले से मतदाता सूची में दर्ज नाम,आधार कार्ड अथवा अन्य उपलब्ध सरकारी दस्तावेज़ों को पर्याप्त आधार मानते हुए उनकी प्रक्रिया को आसान बनाया जाए।उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वह सबसे कमजोर और सबसे वंचित व्यक्ति की आवाज़ को भी बराबर महत्व दे। यदि कोई बच्चा अपनी परिस्थितियों के कारण अपने माता-पिता या परिवार का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसके संवैधानिक अधिकार कमजोर पड़ जाएं।अलेक्स सैम ने भावुक शब्दों में कहा कि “जिन बच्चों का कोई अपना नहीं है,उनके लिए सरकार और संविधान ही सबसे बड़ा सहारा हैं। इसलिए ऐसी व्यवस्था बनाई जाए कि कोई भी अनाथ या बेसहारा नागरिक केवल दस्तावेज़ों की कमी के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो।उनकी इस मार्मिक अपील को सामाजिक सरोकार से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा माना जा रहा है,जो हजारों अनाथ और बेसहारा नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में सार्थक पहल साबित हो सकती है।

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