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मकसूद आलम
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पाकुड़-आज जब समाज को जाति,धर्म और मजहब के खांचों में बांटने की कोशिशें होती रहती हैं,तब पाकुड़ शहर का राजापाड़ा गांव का एक शख्स अपनी मेहनत और मोहब्बत से इंसानियत की नई इबारत लिख रहा है।नाम है दुलाल भाष्कर।धर्म से हिंदू, लेकिन दिल में ऐसी मोहब्बत कि पिछले दस वर्षों से हरिणडांगा मुहर्रम कमिटी के लिए पूरे समर्पण के साथ इमाम हुसैन की याद में ताजिया तैयार कर रहे हैं।दुलाल भाष्कर के लिए यह केवल एक कलाकृति नहीं,बल्कि आपसी भाईचारे,प्रेम और सम्मान का प्रतीक है।यही वजह है कि हरिणडांगा मुहर्रम कमिटी के सदस्य उन्हें उनके नाम से कम और “भाईजान” कहकर ज्यादा पुकारते हैं।
दस वर्षों से निभा रहे हैं मोहब्बत का रिश्ता—
मुहर्रम कमिटी के अध्यक्ष हाजी तनवीर आलम के अनुसार दुलाल भाष्कर पिछले करीब दस वर्षों से लगातार ताजिया निर्माण का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कभी इसे हिंदू-मुस्लिम नजरिए से नहीं देखा।उनके लिए यह गांव की एक साझा परंपरा और आपसी सौहार्द का उत्सव है।हर वर्ष मुहर्रम से पहले दुलाल पूरे मनोयोग से ताजिया बनाने में जुट जाते हैं।उनकी मेहनत और कला को देखते हुए कमिटी भी हर साल उन्हें सम्मानित करती है।
लकड़ी से स्टील तक का सफर—
पिछले नौ वर्षों तक दुलाल भाष्कर ने लकड़ी से आकर्षक ताजिए तैयार किए। लेकिन इस बार उन्होंने कुछ नया और भव्य करने की ठानी है। इस वर्ष वे स्टील से ताजिया तैयार कर रहे हैं, जो पहले की तुलना में अधिक मजबूत,आकर्षक और टिकाऊ होगा।इतना ही नहीं,ताजिए के साथ-साथ वे भव्य मीनारों का निर्माण भी कर रहे हैं, जिससे इस बार का मुहर्रम जुलूस और अधिक आकर्षक दिखाई देगा।
भाईजान बन चुका है पहचान–
हरिणडांगा मुहर्रम कमिटी के सदस्यों का कहना है कि दुलाल भाष्कर अब केवल एक कारीगर नहीं, बल्कि कमिटी के परिवार का हिस्सा बन चुके हैं। उनकी सादगी,समर्पण और प्रेम ने उन्हें सभी के दिलों में खास जगह दिलाई है।कमिटी के सदस्य बताते हैं कि जब भी मुहर्रम की तैयारी शुरू होती है,सबसे पहले दुलाल भाष्कर का नाम लिया जाता है।उनके बिना ताजिया निर्माण की कल्पना भी अधूरी लगती है।
एक संदेश पूरे समाज के लिए–
दुलाल भाष्कर की कहानी केवल ताजिया बनाने की कहानी नहीं है। यह उस भारत की तस्वीर है,जहां इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है,जहां प्रेम और सम्मान किसी जाति या मजहब के मोहताज नहीं होते।जब दुलाल अपने हाथों से इमाम हुसैन की याद में ताजिया गढ़ते हैं,तो वह केवल लोहे,लकड़ी या स्टील को आकार नहीं देते, बल्कि समाज में भाईचारे, एकता और मोहब्बत की ऐसी मीनार खड़ी करते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेगी।दुलाल भाष्कर का यह प्रयास बताता है कि दिलों को जोड़ने के लिए किसी धर्म की नहीं,सिर्फ सच्ची इंसानियत की जरूरत होती है।


