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Maqsood Alam
(News Head)

गोल्ड मेडल से टोटो तक: झारखंड का वह खिलाड़ी जिसे सरकार भूल गई!

Gunjan Saha
(Desk Head)

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मकसूद आलम@समाचार चक्र

पाकुड़-एक समय था जब पाकुड़ जिले के युवा खिलाड़ी हबीबूर शेख ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर पूरे जिले और राज्य का नाम रोशन किया था। लेकिन आज वही खिलाड़ी आर्थिक तंगी से जूझते हुए अपने परिवार का पेट पालने के लिए बैंक से लोन लेकर टोटो चलाने को मजबूर है।यह कहानी केवल एक खिलाड़ी की नहीं,बल्कि उन तमाम प्रतिभाओं की है जो पदक जीतने के बाद भी सरकारी सहायता और प्रोत्साहन के अभाव में गुमनामी के अंधेरे में खो जाती हैं।

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2016 में जीता था गोल्ड मेडल

पाकुड़ जिले के हबीबूर शेख ने 28 अगस्त 2016 को आयोजित झारखंड स्टेट साइक्लिंग चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रथम स्थान प्राप्त किया था।प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने जिले और राज्य का गौरव बढ़ाया था।उस समय लोगों को उम्मीद थी कि हबीबूर को सरकारी स्तर पर प्रोत्साहन मिलेगा,खेल प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए सहायता दी जाएगी और उन्हें बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे। लेकिन समय बीतता गया और उम्मीदें धीरे-धीरे धूमिल होती चली गईं।

सरकारी मदद नहीं मिली, सपने टूट गए
हबीबूर बताते हैं कि राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने के बाद भी उन्हें न तो कोई स्थायी सहायता मिली और न ही खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सहयोग। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे अपने खेल करियर को आगे नहीं बढ़ा सके।परिवार की जिम्मेदारियों और रोजी-रोटी की चिंता ने उनके सपनों को पीछे छोड़ दिया। जिस खिलाड़ी के हाथों में कभी साइकिलिंग की हैंडल थी,आज उसके हाथों में टोटो की स्टीयरिंग है।

टोटो चलाकर चला रहे हैं परिवार—

परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए हबीबूर शेख ने बैंक से ऋण लेकर एक टोटो खरीदा।अब वे रोजाना सड़कों पर टोटो चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। उनका कहना है कि खेल के प्रति आज भी उनका जुनून कम नहीं हुआ है, लेकिन आर्थिक मजबूरियों ने उन्हें दूसरा रास्ता अपनाने पर विवश कर दिया।

खिलाड़ियों के लिए बड़ा सवाल—

हबीबूर शेख की कहानी राज्य की खेल व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करती है। क्या केवल मेडल जीतना ही खिलाड़ी का कर्तव्य है? क्या राज्य और समाज की जिम्मेदारी नहीं बनती कि ऐसे खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का अवसर दिया जाए?यदि समय पर सहायता और उचित मार्गदर्शन मिला होता तो संभव है कि हबीबूर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झारखंड का प्रतिनिधित्व करते।

आज भी सम्मान और सहयोग की उम्मीद—

हबीबूर शेख को आज भी उम्मीद है कि सरकार और खेल विभाग उनकी उपलब्धियों पर ध्यान देगा। उनका मानना है कि यदि उन्हें उचित सहायता मिले तो वे फिर से खेल जगत में सक्रिय होकर युवाओं को प्रेरित कर सकते हैं।

डीसी मेघा भारद्वाज से बढ़ी उम्मीद,क्या मिलेगी हबीबूर शेख की प्रतिभा को नई उड़ान?

झारखंड स्टेट साइक्लिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर जिले और राज्य का नाम रोशन करने वाले हबीबूर शेख की कहानी अब प्रशासन के लिए भी एक महत्वपूर्ण विषय बन सकती है। आर्थिक तंगी के कारण टोटो चलाकर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हबीबूर को लेकर खेल प्रेमियों और सामाजिक संगठनों में चर्चा तेज है।लोगों की निगाहें अब पाकुड़ की उपायुक्त मेघा भारद्वाज पर टिकी हैं। जिले में शिक्षा,स्वास्थ्य,खेल और जनकल्याण से जुड़े मामलों में सक्रिय भूमिका निभाने वाली डीसी से खिलाड़ियों को काफी उम्मीदें हैं। खेल प्रेमियों का मानना है कि यदि प्रशासन हबीबूर जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी की सुध लेता है तो न केवल एक खिलाड़ी का जीवन बदल सकता है,बल्कि जिले के हजारों युवाओं को भी प्रेरणा मिलेगी।

मोबाइल में कैद हैं दर्जनों मेडल,लेकिन मदद का कोई हाथ नहीं—

झारखंड स्टेट साइक्लिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने वाले हबीबूर शेख की जिंदगी आज संघर्षों से भरी हुई है। कभी साइकिल ट्रैक पर अपनी रफ्तार से पहचान बनाने वाले हबीबूर आज टोटो चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आता है,जब कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति,अधिकारी या पत्रकार उनसे मिलने पहुंचता है। हबीबूर अपने मोबाइल फोन की गैलरी खोलते हैं और उसमें सहेज कर रखी अपनी उपलब्धियों की तस्वीरें,प्रमाण पत्र और दर्जनों मेडल दिखाने लगते हैं।उनके चेहरे पर एक उम्मीद झलकती है कि शायद सामने वाला व्यक्ति उनकी पीड़ा समझेगा,शायद कोई उनकी प्रतिभा को पहचान दिलाएगा,शायद कोई उनकी मदद के लिए आगे आएगा।एक स्वर्ण पदक विजेता खिलाड़ी की यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है। जिस खिलाड़ी ने राज्य का गौरव बढ़ाया,आज वही खिलाड़ी अपनी उपलब्धियों को मोबाइल स्क्रीन पर दिखाकर लोगों से अपनी पहचान साबित करने को मजबूर है। खेल के मैदान में जीते गए मेडल अब अलमारी की शोभा नहीं,बल्कि मोबाइल की तस्वीरों में कैद होकर रह गए हैं।हबीबूर की आंखों में आज भी सपने हैं,लेकिन उन सपनों को उड़ान देने वाला कोई मसीहा अभी तक नहीं मिला। उन्हें उम्मीद है कि प्रशासन,जनप्रतिनिधि,खेल विभाग या समाज का कोई संवेदनशील व्यक्ति उनकी मेहनत और संघर्ष को समझेगा और उनके जीवन में फिर से उम्मीद की किरण जगाएगा।शायद किसी दिन उनके मोबाइल में सहेजी गई मेडल की तस्वीरें किसी जिम्मेदार व्यक्ति की नजरों तक पहुंचें और एक भूले-बिसरे खिलाड़ी की जिंदगी बदल दे.

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