समाचार चक्र संवाददाता
पाकुड़। न्यायालय के समक्ष गलत अथवा विरोधाभासी रिपोर्ट प्रस्तुत करना एक पुलिस अनुसंधानकर्ता को भारी पड़ गया। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश दिवाकर पांडे की अदालत ने जब्त वाहन को मुक्त कराने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस अनुसंधानकर्ता की रिपोर्टों में गंभीर विरोधाभास पाया। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि अनुसंधानकर्ता सहायक अवर निरीक्षक मृत्युंजय कुमार की रिपोर्ट ने न्यायालय को गुमराह किया और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित किया।मामले में अदालत ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली। साथ ही अनुसंधानकर्ता के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 379 के तहत जांच का आदेश दिया है। अदालत ने IO को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पुलिस अधीक्षक, पाकुड़ को भी आवश्यक कार्रवाई के लिए आदेश की प्रति भेजने का निर्देश दिया है।
एक वाहन… दो रिपोर्ट और खुल गई पुलिस की पोल—
पूरा मामला लिट्टीपाड़ा थाना कांड संख्या 59/2025 से जुड़ा है। रविकांत रवि ने अपने जब्त वाहन जेएच18एल -5627 को मुक्त कराने के लिए न्यायालय में आवेदन दिया था।मामले में न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी की अदालत ने 7 अप्रैल 2026 को वाहन मुक्ति की याचिका खारिज कर दी थी। आदेश में कहा गया था कि वाहन के राजसात की कार्यवाही शुरू हो चुकी है, इसलिए वाहन को मुक्त नहीं किया जा सकता।यहीं से मामला जिला एवं सत्र न्यायालय पहुंचा और पुलिस की रिपोर्टों का विरोधाभास सामने आ गया।
पहली रिपोर्ट में कहा डीसी ने राजसात की कार्रवाई शुरू कर दी—
अदालत के समक्ष अनुसंधानकर्ता मृत्युंजय कुमार ने 1 फरवरी 2026 को रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसमें बताया गया कि संबंधित वाहन के राजसात की कार्रवाई उपायुक्त, पाकुड़ द्वारा शुरू कर दी गई है।इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर निचली अदालत ने वाहन को मुक्त करने की याचिका खारिज कर दी थी।लेकिन जब मामला प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में पहुंचा तो पुलिस की इसी रिपोर्ट पर सवाल खड़े हो गए।
दूसरी रिपोर्ट में पलट गया पूरा दावा—
अदालत के समक्ष अनुसंधानकर्ता ने 3 जुलाई 2026 को दूसरी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें पहले दावे के ठीक विपरीत कहा गया कि वाहन के संबंध में कोई राजसात की कार्यवाही शुरू ही नहीं हुई है।एक ही वाहन और एक ही मामले में पुलिस अनुसंधानकर्ता की दोनों रिपोर्टों में इस बड़े विरोधाभास को अदालत ने गंभीरता से लिया।अदालत ने मामले में दर्ज धाराओं का भी परीक्षण किया। मामला भारतीय न्याय संहिता की धारा 281, 106(1), 125(a) और 125(b) के तहत दर्ज है। अदालत के आदेश के अनुसार, इन धाराओं में वाहन के राजसात किए जाने का प्रावधान नहीं है।
अदालत ने पूछा-आखिर पहली रिपोर्ट किस आधार पर दी गई?
दोनों रिपोर्टों के बीच विरोधाभास और राजसात के कानूनी आधार को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने पर अदालत ने अनुसंधानकर्ता की भूमिका को गंभीरता से लिया।अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि अनुसंधानकर्ता द्वारा दी गई पहली रिपोर्ट न्यायालय को गुमराह करने वाली थी और इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई।यानी जिस रिपोर्ट के आधार पर निचली अदालत ने वाहन छोड़ने से इनकार किया, बाद की रिपोर्ट में उसी पुलिस अधिकारी ने उस कार्रवाई के अस्तित्व से ही इनकार कर दिया।
निचली अदालत का आदेश रद्द,वाहन मुक्ति की राह साफ–
प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश दिवाकर पांडे की अदालत ने निचली अदालत द्वारा 7 अप्रैल 2026 को पारित आदेश को रद्द कर दिया।अदालत ने याचिकाकर्ता की क्रिमिनल रिवीजन संख्या 34/2026 को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के आदेश को अवैध ठहराया।
अब अनुसंधान की रिपोर्ट की होगी जांच—
मामले में अदालत ने केवल निचली अदालत का आदेश रद्द करने तक खुद को सीमित नहीं रखा। पुलिस अनुसंधानकर्ता द्वारा प्रस्तुत दोनों रिपोर्टों को गंभीरता से लेते हुए BNSS की धारा 379 के तहत जांच शुरू करने का आदेश दिया गया है।इसके साथ ही अनुसंधानकर्ता मृत्युंजय कुमार को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।अब उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि एक ही वाहन और एक ही मामले में दो अलग-अलग रिपोर्ट क्यों प्रस्तुत की गईं और पहली रिपोर्ट में राजसात की कार्रवाई शुरू होने की बात किस आधार पर कही गई थी।
पुलिस कप्तान पाकुड़ को भी भेजी जाएगी रिपोर्ट—
अदालत ने अपने कार्यालय को निर्देश दिया है कि आदेश की प्रति के साथ अनुसंधानकर्ता द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत की गई दोनों रिपोर्टों की प्रतियां पुलिस अधीक्षक,पाकुड़ को भेजी जाएं।इससे अब पुलिस विभाग के स्तर पर भी अनुसंधानकर्ता की भूमिका की जांच और आवश्यक कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।
कोर्ट में पुलिस की रिपोर्ट ही बनी सबसे बड़ा सवाल—
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि न्यायालय में प्रस्तुत की गई पहली रिपोर्ट आखिर किस आधार पर तैयार की गई थी?अगर वास्तव में वाहन के राजसात की कोई कार्रवाई शुरू नहीं हुई थी, तो न्यायालय के समक्ष ऐसी रिपोर्ट क्यों दी गई?और यदि कार्रवाई शुरू हुई थी,तो बाद की रिपोर्ट में उसके शुरू नहीं होने की बात क्यों कही गई?अदालत के सख्त रुख के बाद अब इन सवालों का जवाब अनुसंधानकर्ता को देना होगा।
फैसले का संदेश साफ है—जांच अधिकारी की रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसमें तथ्य छिपाने, गलत जानकारी देने या विरोधाभासी तथ्य पेश करने की स्थिति में अदालत कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगी।अब निगाहें बीएनएसएस की धारा 379 के तहत होने वाली जांच और पुलिस अधीक्षक स्तर पर होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं।
