मकसूद आलम की ग्राउंड रिपोर्ट
पाकुड़-कहते हैं, जिन बच्चों के सिर से माता-पिता का साया उठ जाता है, उनकी जिंदगी की राह आसान नहीं होती। बचपन में जब दूसरे बच्चे मां की ममता और पिता के स्नेह के बीच अपने सपनों की दुनिया बुन रहे होते हैं, तब कुछ बच्चे जिंदगी की सबसे बड़ी जिम्मेदारियों से जूझना सीख रहे होते हैं। पाकुड़ जिले के हिरणपुर प्रखंड के तोड़ाई गांव की 19 वर्षीय आशिफा प्रवीण की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि जिंदगी की वह हकीकत है, जिसने आशिफा से महज 10 वर्ष की उम्र में पिता का साया छीन लिया। अभी वह इस सदमे से पूरी तरह उबर भी नहीं पाई थी कि चार साल बाद कोरोना काल में 14 वर्ष की उम्र में मां का भी निधन हो गया। छोटी उम्र में ही आशिफा अनाथ हो गईं। बचपन में जिन हाथों को उसे थामकर आगे बढ़ना था, वही हाथ हमेशा के लिए उससे छूट गए।
संकट में प्रशासन बना सहारा—
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माता-पिता के निधन के बाद आशिफा के सामने पढ़ाई और भविष्य को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया। ऐसे समय में जिला प्रशासन की पहल पर बाल संरक्षण इकाई के माध्यम से स्पॉन्सरशिप योजना के तहत उसे करीब ढाई वर्षों तक प्रत्येक माह चार हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी गई।यह मदद उसके लिए केवल आर्थिक सहयोग नहीं,बल्कि कठिन समय में आगे बढ़ने का एक सहारा बनी। लेकिन अब यह सहायता बंद हो चुकी है और आशिफा एक बार फिर अपने भविष्य को लेकर जिला प्रशासन की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रही है।
चाचा ने निभाई अभिभावक की भूमिका—
माता-पिता के जाने के बाद आशिफा को अकेला नहीं छोड़ने वालों में उसके चाचा मोहम्मद अफरोज सबसे आगे रहे.उन्होंने अभिभावक बनकर आशिफा को हिम्मत दी और उसके हर सुख-दुख में साथ खड़े रहे।आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियां भले ही चुनौतीपूर्ण रही हों, लेकिन चाचा के सहयोग और आशिफा की अपनी मजबूत इच्छाशक्ति ने उसे पढ़ाई जारी रखने का हौसला दिया।
डीएवी से पढ़ाई,अब अंग्रेजी ऑनर्स की छात्रा—
आशिफा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा डीएवी स्कूल,पाकुड़ से पूरी की। वर्तमान में वह केकेएम कालेज से अंग्रेजी ऑनर्स से बीए की पढ़ाई कर रही है और सेमेस्टर-3 में है।माता-पिता के नहीं रहने के बावजूद पढ़ाई के प्रति उसका लगाव कम नहीं हुआ। बल्कि शिक्षा ही उसके लिए अपने जीवन को नई दिशा देने का सबसे बड़ा माध्यम बन गई है।
डीसी मैडम सहयोग करेंगी तो बीए पूरा कर नेट की तैयारी करूंगी—
आशिफा की आंखों में अपने भविष्य को लेकर एक स्पष्ट सपना है। वह कहती है कि यदि डीसी मैडम उसका सहयोग करेंगी तो वह अपनी बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद नेट की तैयारी करना चाहती है।उसका सपना शिक्षक बनने का है। आशिफा का कहना है कि वह शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़कर अपने समाज और देश की सेवा करना चाहती है।उसकी कहानी में दर्द बहुत है,लेकिन उससे कहीं ज्यादा उम्मीद है। माता-पिता के जाने के बाद जिंदगी ने उसके सामने कई मुश्किलें खड़ी कीं, मगर आशिफा ने उन मुश्किलों को अपने सपनों के रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया।
अब जरूरत है हाथ बढ़ाने की—
आशिफा को आज किसी सहानुभूति से अधिक अपने सपनों को पूरा करने के लिए एक मजबूत सहारे की जरूरत है। प्रशासन की ओर से पहले मिली सहायता ने उसे आगे बढ़ने का अवसर दिया। अब वह चाहती है कि उसकी पढ़ाई बीच में न रुके और वह अपने लक्ष्य तक पहुंच सके।एक अनाथ बेटी की आंखों में शिक्षक बनने का सपना है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या व्यवस्था उस सपने को टूटने से पहले उसका हाथ थामेगी?आशिफा की कहानी उन तमाम बच्चों की भी तस्वीर है,जिनके सिर से माता-पिता का साया बहुत छोटी उम्र में उठ जाता है, लेकिन वे परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय शिक्षा के सहारे अपनी जिंदगी बदलने का सपना देखते हैं।
