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मां सिर्फ जन्म देने वाली ही नहीं होती, बल्कि वह होती है जो हर मुश्किल में अपने बच्चों का सहारा बन जाए। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है 80 वर्षीय दादी मां की, जिन्होंने उम्र के इस पड़ाव में भी मां का फर्ज निभाते हुए अपने दो पोतों को पाल-पोस कर बड़ा किया
मकसूद आलम की रिपोर्ट
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पाकुड़। जिंदगी के आखिरी पड़ाव में भी सफेद साड़ी में चेहरे पर मुस्कान लिए घर को संभालने के साथ-साथ पंचायत के काम-काज में व्यस्तता ही मुखिया सुसन्ना मरांडी की दिनचर्या बन गया है। जिला मुख्यालय से बिल्कुल सटा सोनाजोड़ी पंचायत से तीन-तीन बार मुखिया बनी सुसन्ना मरांडी की उम्र आज 75 साल है। लेकिन आज भी उनके चेहरे पर किसी तरह का शिकन नहीं है। पहले पति और फिर एकमात्र बेटे को खोने के बाद 65 साल की उम्र में खुद को संभालना बिल्कुल भी आसान नहीं था। पति की शोक में दिन गुजार ही रही थी, आठ साल में घर का सहारा और एकमात्र बेटा भी गुजर गया। इसके बावजूद ना सिर्फ पूरे परिवार और खुद को संभाला, बल्कि दो छोटे-छोटे पोते और बहू को भी हिम्मत दी। एक महिला ने अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में भी सारे दुःख दर्द को भुलाकर विधवा बहू को भी सास के रूप में मां का वो प्यार दिया, जो आज के समाज में बहुत ही कम देखने को मिलता है। अक्सर ही सास-बहू की लड़ाई की घटनाएं सामने आती रहती है, पर सुसन्ना मरांडी जैसी एक बुजुर्ग महिला और विधवा बहू का एक-दूसरे के प्रति प्यार और सम्मान वाकई में समाज के लिए मिसाल है। यही सच्ची कहानी सोनाजोड़ी पंचायत की तीन-तीन टर्म की मुखिया 75 साल की सुसन्ना मरांडी की है। जिन्होंने अपने जीवन में काफी दर्द झेला है। मुखिया सुसन्ना मरांडी कहती हैं कि जीवन में समस्याएं आती रहती है, लेकिन समस्याओं से बिल्कुल भी घबराना नहीं है, बल्कि उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। वह कहती हैं कि आपके साथ जब कुछ घटनाएं होती हैं तो यह मानकर चलिए कि ईश्वर को यही मंजूर है। मुखिया सुसन्ना मरांडी ने महिला दिवस के सुअवसर पर खास बातचीत में अपने जीवन में आए उतार चढ़ाव और विपत्तियों का जिक्र करते हुए कहा कि साल 2008 में पति का देहांत हो गया। इसी गम में जी रही थी, कि साल 2016 में एकमात्र बेटा भी चल बसा। उन्होंने कहा कि मेरे जीवन में कठिन से कठिन पल आए, काफी उतार चढ़ाव देखा, लेकिन समाज का बहुत बड़ा सपोर्ट मिला, जिससे मुझे हिम्मत मिली। मैं जब भी निराश हो जाती, समाज के लोग मेरे पास आते और कहते कि आप में सहनशक्ति है। आप अपने जीवन की समस्याओं के सामने झुक नहीं सकती। आपके साथ पूरा समाज खड़ा है। इन्हीं बातों से मुझे हिम्मत मिलती और मैं अपने सारे गमों को भूला कर खुद को और परिवार को और मेरे घर जैसे पंचायत को संभालने में मदद मिली। उन्होंने कहा कि बेटे के निधन के वक्त दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ मेरी बहू विधवा हो गई। इस घर में मैं, मेरी बहू और मेरे दो छोटे-छोटे पोते रह गए। मैंने समाज के सपोर्ट से परिवार को संभाला। मेरी और बहू के बीच इतनी अच्छी तालमेल रही कि बहू ने मुझे सास कम और मान ज्यादा समझी। मैं भी बहु को अपनी बेटी की तरह समझी। मैं कह सकती हूं कि यह मेरी बहू नहीं, बल्कि मेरी बेटी है। उन्होंने कहा कि एक बार ऐसा भी आया कि मेरी बहू के मायके वालों ने अपनी बेटी को साथ अपने घर ले जाना चाहा। लेकिन मेरी बेटी जैसी बहू ने ही अपने माता-पिता को साथ जाने से मना कर दिया। मेरी बहू का साफ तौर पर कहना था कि ठीक है मैं तो दो बच्चों के साथ आप लोगों के साथ चली जाऊंगी और रह भी लूंगी। लेकिन मेरी एक और बुढ़ी मां है, वो कहां जाएंगी। इस बात से मेरे बहू के माता-पिता भी भावुक हो गए और उन्होंने अपनी बेटी को शाबाशी दी और गर्व के साथ बेटी की बातों को मानकर लौट गए। उन्होंने कहा कि महिला दिवस पर मैं सभी माताओं को और सभी महिलाओं को यही संदेश देना चाहती हूं कि आपके सामने जटिल समस्याएं भी आए, तो उसका सामना करें। आप खुद में विश्वास जगाएं और हिम्मत और पूरी ताकत के साथ हर समस्याओं का मुकाबला करें। यही सही मायने में मातृ शक्ति भी है।


