अबुल काशिम@समाचार चक्र
पाकुड़। जिला मुख्यालय से महज चार किलोमीटर दूर इशाकपुर पंचायत का रणडांगा गांव आज अपनी एक अजीज और ऐतिहासिक धरोहर के खोने के गम में डूबा है, लेकिन साथ ही एक नई उम्मीद को भी सींच रहा है। गांव के मेहनतकश लोगों की पहचान से इतर, मेन रोड किनारे खड़ा करीब दो सौ साल पुराना विशालकाय बरगद का पेड़ सिर्फ एक वृक्ष नहीं, बल्कि इस गांव की आत्मा था। अंग्रेजी हुकूमत के दौर से सीना ताने खड़ा यह बरगद राहगीरों के लिए गांव का पता था, तो तपती धूप और चिलचिलाती गर्मी की रातों में ग्रामीणों के लिए सुकून का आशियाना। लेकिन, प्रकृति के एक क्रूर थपेड़े ने दो सदियों के इस अटूट साथ को एक पल में छिन लिया। बीते दिनों आई तेज आंधी और हवा के प्रचंड वेग ने इस विशाल पेड़ को धराशायी कर दिया। जब 200 साल पुराना यह दरख्त टूटकर गिरा और उसकी शाखाएं बिखर गईं, तो ग्रामीणों के लिए यह मंजर किसी अपने प्रियजन को हमेशा के लिए खो देने जैसा था। गांव की आत्मा बन चुके इस पेड़ को रास्ते से हटाना प्रशासन और ग्रामीणों की मजबूरी तो था, लेकिन जब इसकी लकड़ी और शाखाएं उठाई जा रही थीं, तब वहां मौजूद हर शख्स की आंखें छलक पड़ीं। पेड़ के हटने के बाद खाली हुई जगह ग्रामीणों के दिलों को बार-बार झकझोर रही थी। दो सदी पुरानी यादों और इस बेहिसाब गम को भुलाना किसी के लिए मुमकिन नहीं था। इस आत्मिक पीड़ा से उबरने और मन की शांति के लिए रणडांगा के ग्रामीणों ने एक मिसाल पेश की है। पूरे गांव ने आपसी सहमति बनाकर ठीक उसी स्थान पर बरगद का एक नया और छोटा सा पौधा रोपित कर दिया है। पौधे को मवेशियों और बाहरी नुकसान से बचाने के लिए चारों तरफ से सुरक्षित घेर दिया गया है। आज पूरा रणडांगा गांव मिलकर इस छोटे से पौधे की देखरेख कर रहा है।
“छांव खोई है, उम्मीद नहीं”- ग्रामीणों ने पेश की सीख
परंपरा और अहसास का रिश्ता:
इस पहल पर गांव के बुजुर्गों और युवाओं की बातों में एक गहरा संदेश छिपा है। ग्रामीणों का कहना है, “हमारे पूर्वजों ने जिस पेड़ की छांव में जिंदगी गुजारी, वह ढह जरूर गया, लेकिन उसकी जड़ें हमारे विचारों में आज भी जिंदा हैं। यह नया पौधा सिर्फ एक वृक्ष नहीं, बल्कि हमारे बुजुर्गों की याद और आने वाली नस्लों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।
प्रकृति संरक्षण का संदेश:
गांव के युवाओं का कहना है कि प्रकृति ने अगर हमसे हमारा दो सौ साल पुराना साथी छीना है, तो यह हमारा फर्ज बनता है कि हम उसकी जगह नई जिंदगी रोपें। अगर हर गांव आपदा के बाद शोक मनाने के बजाय इस तरह पौधा रोपने लगे, तो धरती कभी वीरान नहीं होगी। ग्रामीणों को पूरा विश्वास है कि आज का यह छोटा सा पौधा आने वाली पीढ़ियों के लिए फिर से वही छांव, वही पहचान और गांव की वही अमर आत्मा बनकर लहराएगा।

