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मकसूद आलम
पाकुड़-पूर्व मंत्री आलमगीर आलम के जेल जाने के बाद पाकुड़ विधानसभा की राजनीति अचानक बदल गई थी। एक तरफ कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों में मायूसी थी, तो दूसरी तरफ विरोधी दलों को लगने लगा था कि अब आलमगीर आलम का राजनीतिक प्रभाव कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन इसी कठिन दौर में एक नया चेहरा धीरे-धीरे लोगों के बीच उभरकर सामने आया तनवीर आलम जब पिता जेल में थे,तब तनवीर आलम ने परिवार,समर्थकों और राजनीतिक जिम्मेदारियों को जिस तरीके से संभाला,उसकी चर्चा अब पूरे पाकुड़ विधानसभा क्षेत्र में होने लगी है। समर्थकों का कहना है कि “मुश्किल वक्त में ही असली नेतृत्व की पहचान होती है”और तनवीर आलम ने इस कठिन परीक्षा में खुद को साबित करने का प्रयास किया।
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अपने भी जब पराये हुए, फिर भी नहीं हारी हिम्मत—
राजनीति के जानकार बताते हैं कि किसी भी बड़े नेता के कठिन समय में कई लोग दूरी बना लेते हैं। ऐसा दौर आलमगीर आलम के परिवार ने भी देखा। लेकिन इन परिस्थितियों के बीच तनवीर आलम लगातार लोगों के बीच डटे रहे।समर्थकों का कहना है कि कई बार राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर उन्हें आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा,लेकिन उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया।हर कार्यक्रम,हर दुख-सुख और हर सामाजिक आयोजन में वे सक्रिय नजर आए।यही कारण है कि धीरे-धीरे लोगों का भरोसा उन पर बढ़ता गया।
कार्यकर्ताओं का टूटता मनोबल संभाला-—
आलमगीर आलम के जेल जाने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं में निराशा का माहौल था।ऐसे समय में तनवीर आलम लगातार कार्यकर्ताओं से संपर्क में रहे।उन्होंने गांव-गांव जाकर समर्थकों से मुलाकात की और संगठन को एकजुट रखने की कोशिश की।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि उस समय संगठन को संभालने वाला कोई चेहरा सामने नहीं आता, तो कांग्रेस को बड़ा नुकसान हो सकता था। लेकिन तनवीर आलम ने युवा ऊर्जा के साथ कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरने का काम किया।

युवाओं के बीच बढ़ रही लोकप्रियता—
पाकुड़ विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में युवा अब तनवीर आलम को नए नेतृत्व के रूप में देखने लगे हैं। सोशल मीडिया से लेकर जनसंपर्क अभियान तक, उनकी सक्रियता लगातार बढ़ी है।आम लोगों की समस्याओं में शामिल होना,सामाजिक कार्यक्रमों में पहुंचना और समर्थकों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखना उनकी पहचान बनती जा रही है।स्थानीय लोगों का कहना है कि तनवीर आलम ने केवल राजनीति नहीं की, बल्कि कठिन समय में लोगों के साथ खड़े रहने का संदेश दिया। यही वजह है कि आज हर वर्ग और हर समुदाय के लोग उन्हें गंभीरता से देखने लगे हैं।
क्या पाकुड़ को मिल सकता है नया युवा चेहरा ?––
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले समय में तनवीर आलम पाकुड़ विधानसभा की राजनीति में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। समर्थक खुलकर उन्हें “भावी विधायक” कहने लगे हैं।हालांकि राजनीति में भविष्य का फैसला जनता करती है, लेकिन इतना जरूर है कि जिस तरह कठिन समय में तनवीर आलम ने जिम्मेदारियां संभालीं, उसने उन्हें राजनीति में एक अलग पहचान दिलाई है।अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में तनवीर आलम किस तरह अपनी राजनीतिक यात्रा को आगे बढ़ाते हैं और क्या वे अपने पिता की राजनीतिक विरासत को नए अंदाज में आगे ले जाने में सफल होते हैं।

पिता जेल में थे,बेटे ने संभाली राजनीति की कमान,तनवीर आलम ने मां निशात आलम को रिकॉर्ड मतों से दिलाई जीत—
पूर्व मंत्री आलमगीर आलम के जेल जाने के बाद पाकुड़ विधानसभा की राजनीति में एक बड़ा खालीपन महसूस किया जा रहा था।समर्थकों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी संगठन को एकजुट रखना और जनता का भरोसा कायम रखना। ऐसे कठिन समय में उनके पुत्र तनवीर आलम ने आगे बढ़कर पूरी राजनीतिक कमान संभाली. राजनीतिक जानकारों के अनुसार उस दौर में विरोधी दलों को लग रहा था कि आलमगीर आलम की अनुपस्थिति से कांग्रेस कमजोर पड़ जाएगी, लेकिन तनवीर आलम ने लगातार जनता के बीच रहकर हालात को बदलने का काम किया। गांव-गांव जाकर लोगों से मुलाकात करना,कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना और संगठन को सक्रिय रखना उनकी प्राथमिकता बनी रही।इसी बीच चुनावी मैदान में उनकी मां निशात आलम उतरीं। चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल काफी गर्म था,लेकिन तनवीर आलम ने दिन-रात मेहनत कर चुनाव प्रचार की कमान संभाली। समर्थकों का कहना है कि उन्होंने हर बूथ और हर गांव तक पहुंचकर लोगों को जोड़े रखा।चुनाव परिणाम आने के बाद निशात आलम की रिकॉर्ड मतों से जीत ने पूरे राजनीतिक समीकरण को बदल दिया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इसे जनता का भरोसा और आलमगीर परिवार के प्रति लोगों के प्रेम का परिणाम बताया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस जीत के पीछे तनवीर आलम की रणनीति,मेहनत और जनता के बीच लगातार सक्रियता बड़ी वजह रही।


