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मकसूद आलम
पाकुड़-बढ़हरवा की मिट्टी ने कई नेताओं को जन्म दिया,लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो लोगों के दिलों में बस जाते हैं। उन्हीं नामों में एक नाम था थॉमस हांसदा का।सादगी,संघर्ष और आदिवासी समाज की आवाज बनकर राजनीति करने वाले थॉमस हांसदा ने हमेशा गरीब,मजदूर और वंचित लोगों के हक की लड़ाई लड़ी।समय बदला,लेकिन लोगों का भरोसा नहीं बदला। पिता की राजनीतिक विरासत और जनता के प्यार को अब उनके पुत्र विजय हांसदा आगे बढ़ा रहे हैं।
कहा जाता है कि राजनीति में विरासत मिल सकती है, लेकिन जनता का विश्वास मेहनत से कमाना पड़ता है। विजय हांसदा ने यही कर दिखाया। राजमहल लोकसभा क्षेत्र से लगातार तीन बार जीत हासिल कर उन्होंने साबित कर दिया कि जनता आज भी हांसदा परिवार को अपने दिल में बसाए हुए है।
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विजय ने भाजपा को तीन बार हराया…
भाजपा जैसे मजबूत प्रतिद्वंदी को लगातार तीन चुनावों में हराना कोई आसान बात नहीं थी। हर चुनाव में चुनौतियां बढ़ीं, आरोप लगे,राजनीतिक हमले हुए,लेकिन विजय हांसदा पीछे नहीं हटे। गांव-गांव जाकर लोगों का दर्द सुना,आदिवासियों, गरीबों और किसानों की आवाज संसद तक पहुंचाई। लोग आज भी कहते हैं कि थॉमस हांसदा भले इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी सोच और संघर्ष विजय हांसदा के रूप में आज भी जिंदा है।राजमहल की जनता के लिए यह सिर्फ राजनीति नहीं,बल्कि भावनाओं और विश्वास का रिश्ता है।शायद यही वजह है कि हांसदा परिवार का नाम आते ही लोगों की आंखों में सम्मान और उम्मीद दोनों दिखाई देती है।
बगावत भी विरासत बनी, संघर्ष भी पहचान…
राजनीति में कुछ फैसले इतिहास बन जाते हैं।ऐसा ही एक दौर तब आया था,जब वरिष्ठ आदिवासी नेता थॉमस हांसदा को कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं दिया। वर्षों तक पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले नेता के साथ हुए इस फैसले ने उनके समर्थकों को भीतर तक झकझोर दिया था।लेकिन थॉमस हांसदा उन नेताओं में नहीं थे जो हालात के सामने घुटने टेक दें। उन्होंने बगावत का रास्ता चुना और राजद के टिकट पर मैदान में उतर गए। वह चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं था,बल्कि आत्मसम्मान,संघर्ष और अपने समर्थकों के विश्वास की लड़ाई बन गया था।कहा जाता है कि इंसान की असली ताकत उसके संघर्षों से बनती है। शायद यही वजह है कि उनके पुत्र विजय हांसदा के व्यक्तित्व में भी वही जिद,वही साहस और वही जनसंघर्ष दिखाई देता है।राजनीतिक जानकार मानते हैं कि विजय हांसदा के खून में संघर्ष और क्रांतिकारी सोच विरासत में मिली है। मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों,वे हर दर्द और हर चुनौती को अमृत समझकर पी जाते हैं।आलोचनाएं हुईं, राजनीतिक वार हुए, विरोधियों ने घेरने की कोशिश की,लेकिन विजय हांसदा हर बार और मजबूती से उभरकर सामने आए।राजमहल की राजनीति में हांसदा परिवार की कहानी सिर्फ चुनाव जीतने की कहानी नहीं है,बल्कि यह संघर्ष,आत्मसम्मान और जनता से जुड़े रहने की कहानी है।एक पिता ने बगावत कर अपनी पहचान बनाई,तो बेटा आज उसी विरासत को संघर्ष और जनविश्वास के सहारे आगे बढ़ा रहा है।
पिता का सपना,मां का संघर्ष और हेमंत सोरेन का मार्गदर्शन बना ताकत–
राजनीति की राह आसान नहीं होती। इस सफर में जहां जनता का विश्वास जरूरी होता है,वहीं परिवार का साथ और बड़ों का मार्गदर्शन इंसान को हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देता है।मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हाथ पकड़कर राजनीति में चलना सिखाया,तो मां हर कदम पर ढाल बनकर साथ खड़ी रहीं। राजनीतिक जीवन के उतार-चढ़ाव में मां ने हमेशा हिम्मत बढ़ाई और सही रास्ता दिखाने का काम किया।वहीं पिता स्वर्गीय थॉमस हांसदा बेटे को जीतते हुए नहीं देख पाए,लेकिन उनका संघर्ष, सादगी और जनता के प्रति समर्पण आज भी प्रेरणा बनकर जिंदा है। लोगों का कहना है कि थॉमस हांसदा ने अपने जीवन में जिस विचारधारा और जनसेवा की नींव रखी थी, उसी रास्ते पर आज उनका परिवार आगे बढ़ रहा है।राजनीति के इस सफर में कई मुश्किलें आईं,लेकिन मां के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भरोसे ने हर चुनौती को आसान बनाने का काम किया।यही वजह है कि आज भी परिवार जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं को सुनने और समाधान की कोशिश में जुटा हुआ है।


